प्रीत मेरी छीनकर बता, तुझे क्या मिला?

प्रीत मेरी छीनकर बता, तुझे क्या मिला?

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

जिंदगी को देने वाले, जिंदगी को लेने वाले,
मेरी प्रीत छीनकर बता, तुझे क्या मिला?
मैंने तो माँगी थीं बस थोड़ी-सी खुशियाँ,
फिर मेरी आँखों को आँसुओं का समंदर क्यों मिला?

मैंने कब तोड़े थे तेरे चाँद-सितारे,
कब तेरे आँगन के उजालों को मिटाया था?
मैंने तो अपने छोटे-से संसार में,
बस प्रेम का एक दीपक जलाया था।
फिर क्यों मेरी रातों से चाँदनी छीन ली,
क्यों मेरे हिस्से में अँधेरा ही अँधेरा मिला?

जिंदगी को देने वाले, जिंदगी को लेने वाले,
मेरी प्रीत छीनकर बता, तुझे क्या मिला?

वह हँसी, वह बातें, वह मीठी-सी यादें,
वह रूठना-मनाना, वे प्रेम की सौगातें,
वह मेरे दुःख में चुपके से आँसू बहाना,
वह मेरी उदासी में मुझे हँसाना।
सब कुछ तो था मेरे जीवन के पास,
फिर क्यों छीन लिया तूने मेरा विश्वास?

अभी तो बहुत-सी बातें अधूरी पड़ी थीं,
अभी तो कई राहें साथ चलनी थीं,
अभी तो बुढ़ापे का सहारा बनना था,
अभी तो एक-दूजे के लिए जीना था।
फिर किस बात की इतनी जल्दी थी तुझे,
मेरी दुनिया उजाड़कर तूने क्या पा लिया?

तुम्हारे बिना अब घर, घर नहीं लगता,
हर कोना तुम्हारी याद दिलाता है।
जिस दरवाजे से तुम्हारे आने की आहट सुनता था,
आज वही दरवाजा मुझे चुपचाप रुलाता है।

मैं आज भी तुमसे बातें करता हूँ,
तुम्हारी तस्वीर देखकर रातें काटता हूँ।
कभी लगता है, तुम यहीं कहीं बैठी हो,
मेरी हर धड़कन में चुपचाप समाई हो।
फिर हकीकत मेरे सामने आकर खड़ी हो जाती है,
और मेरी आँखों से खामोशी बह जाती है।

ऐ मौत! तूने शरीर को मुझसे अलग किया,
पर मेरे प्रेम को मुझसे जुदा न कर सकी।
तूने मेरी प्रियतमा  को मुझसे छीन लिया,
पर उसकी यादों को मुझसे छीन न सकी।
वह आज भी मेरे हर एहसास में रहती है,
मेरी हर साँस उसकी कमी कहती है।

तुझसे शिकायत है, तुझसे ही सवाल है,
मेरे सीने में आज भी एक अधूरा-सा मलाल है।
जिस प्रेम को तूने मेरे जीवन का उजाला बनाया,
उसी प्रेम को छीनकर तूने मुझे क्यों रुलाया?

अब न कोई शिकायत सुनने वाला है,
न मेरे आँसुओं को चुपचाप पोंछने वाला है।
भीड़ में खड़ा हूँ, फिर भी अकेला हूँ,
हँसता हुआ चेहरा हूँ, भीतर से टूटा हुआ हूँ।
लोग कहते हैं, वक्त हर घाव भर देता है,
पर कोई बताए, जो अपना ही चला जाए,
उसके बिना जीने का साहस कौन देता है?

जिंदगी को देने वाले, जिंदगी को लेने वाले,
मेरी प्रीत छीनकर बता, तुझे क्या मिला?
मैंने कब तोड़े थे तेरे चाँद-सितारे,
फिर क्यों बुझा दिए मेरे दिल के उजियारे?

अगर प्रेम करना ही मेरा अपराध था,
तो बता, मेरे प्रेम का इतना कठोर प्रतिफल क्यों था?
अगर बिछुड़ना ही जीवन की कहानी थी,
तो फिर मिलन की इतनी सुंदर निशानी क्यों थी?

अब जब भी रात के सन्नाटे में आँखें भर आती हैं,
तुम्हारी  यादें मेरे पास चली आती हैं।
मैं चुपचाप उससे अपने दिल की बात कहता हूँ,
और टूटे हुए मन को सँभालने की कोशिश करता हूँ।

तुम जहाँ भी हो, मेरी एक बात सुनना,
मेरी यादों के आँगन में तुम यूँ ही रहना।
तुम्हारे बिना मेरी दुनिया अधूरी रहेगी,
पर तुम्हारी प्रेम-कहानी मेरे हृदय में जीवित रहेगी।

यदि मेरी पुकार कहीं तक पहुँचती है,
तो बस इतनी विनती मेरी सुन लेना-
मेरी प्रियतमा  को लौटा नहीं सकते, तो कोई बात नहीं,
उसकी यादों को मेरी कमजोरी नहीं, मेरी शक्ति बनाना।
मेरी आँखों के आँसू मेरे प्रेम की गवाही रहें,
और मेरे हृदय में उसकी स्मृतियों के दीपक जलते रहें।

क्योंकि आज भी मेरे मन में वही प्रश्न पलता है,
हर रात, हर आँसू, हर धड़कन में ढलता है-

जिंदगी को देने वाले, जिंदगी को लेने वाले,
मेरी प्रीत छीनकर बता, तुझे क्या मिला?
मैंने तो बस प्रेम किया था, कोई अपराध नहीं,
फिर मेरे हिस्से में इतना गहरा विरह क्यों लिखा?

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