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"स्वयं से स्वायत्त वार्ता"

"स्वयं से स्वायत्त वार्ता"

पंकज शर्मा
यह जो सन्नाटा है,
शून्य नहीं—
एक भरा हुआ अवकाश है।
अकेलेपन की गूँज में
भय कैसा?
यही तो वह तट है
जहाँ तटस्थ होकर
मैं स्वयं को
आचमन की भाँति पीता हूँ।


भीड़ से छिटक जाना
टूटना नहीं,
अपने घट में लौट आना है।
जब निकटता की आँख से
चेहरों के मुखौटे
उतरने लगे,
तभी इस एकांत का
मौन अंकुरण हुआ।
मैं भागा नहीं,
बस ठहर गया हूँ।


संसार जिसे
उदासीनता या दर्प कहता है,
वह वस्तुतः
विवेक का विश्राम है।
मैंने देखा—
मुस्कानों के पीछे
सौदा चलता था,
और प्रेम का नाम लेकर
अपेक्षाएँ
विपणन करती थीं।


अब न कोई गिला है,
न कोई विद्वेष।
सत्य यही है कि
हर संगति में
मोक्ष नहीं होता।
मैंने कोलाहल को
उनकी सार्थकता लौटा दी,
और अपने लिए
मन की वही
आदिम शांति चुन ली।


यह तन्हाई
सज़ा का साया नहीं,
झूठे सान्निध्य से
प्राप्त हुई
परम मुक्ति है।
छल की गर्द से
धुल जाने के बाद
जो सहज प्रकाश बचता है,
वह मेरी
आंतरिक सत्ता का ही रूप है।


अब मुझे
परछाइयों की गवाही
आवश्यक नहीं लगती।
स्वयं की उपस्थिति ही
पर्याप्त साक्ष्य है।
रंग बदलते इस संसार में
अपनी ही संगति
अंततः सबसे सत्य,
और सबसे पावन
शरण्य सिद्ध हुई।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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