न जाने क्यों, मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ

न जाने क्यों, मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ

कुमार महेंद्र
अंतरमन के शांत सरोवर में,
प्रीत-तरंगें उठने लगीं।
मधुरिम अनुभूतियों से,
चाहत की कलियाँ खिलने लगीं।
निहारकर छवि तुम्हारी,
प्रणय गीत गुनगुनाने लगा हूँ।
न जाने क्यों, मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ।।


जीवन के गलियारों में,
तेरे स्नेह के प्रसून खिले।
अपनेपन की मधुर डोर से,
दो अनजाने हृदय मिले।
हर घड़ी, हर पहर तुम्हारे,
मधुर मिलन के स्वप्न सजाने लगा हूँ।
न जाने क्यों, मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ।।


दृष्टि, सृष्टि, दिशा, क्षितिज में,
दिखता तेरा ही स्वरूप।
राग, रंग और ऋतुएं सारी,
लगतीं तेरे ही अनुरूप।
अधरों की पहली प्रार्थना में,
नाम तुम्हारा दोहराने लगा हूँ।
न जाने क्यों, मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ।।


अंतर्मन के मृदुल घुँघरू,
मधुर मिलन के स्वर छेड़ रहे।
तेरे दर्शन की अभिलाषा,
नव सपनों के द्वार खोल रहे।
तेरे रूप की मधुरिम आभा से,
जीवन-उपवन महकाने लगा हूँ।
न जाने क्यों, मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ।।


चंचल चितवन की आभा से,
मेरा मन भी झूम उठा।
तेरे कोमल स्नेह-स्पर्श से,
सूना जीवन खिल उठा।
प्राणों के हर कोने में,
प्रेम के दीप जलाने लगा हूँ।
न जाने क्यों, मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ