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गरीब कौन---

गरीब कौन---

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
बडी बडी बहस चल रही हैं गरीब के साथ अन्याय को लेकर।
जानना चाहते हैं कि क्या जो लोग सडकों पर निकले यह गरीब हैं अथवा बिहार बंगाल उडीसा जैसे राज्यों मे भी दूरस्थ क्षेत्र मे रहने वाले लोग जिनके पास झोपडी भी नही है, वह गरीब हैं?
प्रश्न यह भी कि वह गरीब क्यों?
रोजगार नही मिलता अथवा करना नही चाहते?
मेरी जिज्ञासा मात्र इतनी है कि गरीब की परिभाषा क्या है और उसका आधार क्या है?

देश मे लगभग 24 करोड बी पी एल परिवार हैं यानि 120 करोड नागरिक। क्या यह सम्भव है कि भारत के 140- 146 करोड आबादी मे इतने लोग बी पी एल मे हों?
बी पी एल यानि गरीबी रेखा से नीचे तब गरीब कौन और कितने?

गरीबी भी तुलनात्मक है। टाटा बिरला की तुलना मे हम सब गरीब ही हैं। मगर सामाजिक व आर्थिक गरीबी अलग है।

कुछ लोग गरीब हैं उनकी पत्नी या बच्चे मजदूरी करते हैं मगर वह खुद काम नही करते अपितु परिवार की मेहनत की कमाई भी दारू मे उडा देते हैं। तब क्या किया जाये उनका सुधार अथवा दारू की दुकान उनके नाम? उस मेहनतकश पत्नी और बच्चों की क्या गलती?

यह सामाजिक चेतना का विषय है।
समाज का एक वर्ग वह भी है जिनका पूरा परिवार छोटे बड़े काम कर रहा है और परिवार की मासिक आय चालीस पचास हज़ार तक है, परन्तु सरकारी दस्तावेज़ों में वह गरीब है।

किसी भी लाईन का मिस्त्री जो प्रतिदिन पन्द्रह सौ दो हज़ार कमाता है, वह भी गरीब है।

सरकारी मकान, मुफ़्त राशन, मुफ़्त शिक्षा चिकित्सा, घर में टीवी फ्रिज बाईक कार, बच्चे अच्छे बड़े पब्लिक स्कूल में परन्तु सिस्टम में वह भी गरीब, आख़िर क्यों?

शायद विगत वर्ष की बात है उत्तर प्रदेश में यह समाचार आया कि जिन लोगों के पक्के मकान हैं, बाईक है, उन्हें मुफ़्त राशन या अन्य सुविधा नहीं मिलेगी और जाँच कर पता किया जायेगा तथा नियमानुसार देय अनाज का बाज़ार शुल्क वसूला जाएगा, तो सुना था कि घोषणा के बाद कई लाख राशन कार्ड निलम्बित हो गये थे। यानि फ़र्ज़ी गरीब भागने शुरू।

कोरोना काल से वर्तमान तक अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन सरकार की ओर से वितरित किया जा रहा है। कोई नहीं जानना चाहता उनकी आर्थिक सामाजिक स्थिति।
महिलाओं के हितों में प्रतिदिन नई नई घोषणाएँ- कोई कहता छह हजार रुपये महीना तो कोई वर्ष में पचास हजार।
क्यों इस प्रकार की योजनाओं को लाया जाता है? क्या यह सब गरीब हैं?

आश्चर्यजनक यह है कि इन सबमें गरीबी का पैमाना जाति धर्म अगडा पिछड़ा वर्ग विशेष देखकर ही किया जाता है।
कोई तथाकथित सवर्ण गरीबी के इनके ढाँचे और खाँचे में फिट नहीं बैठता है।

समर्थ सक्षम उच्च पद पर आसीन वर्ग विशेष के बच्चे गरीब और सभी प्रकार की परीक्षाओं में शुल्क से माफ़ी और वास्तविक गरीब जो सवर्ण जाति से है, उसके लिये भारी भरकम शुल्क, यही है व्यवस्था का दोहरा चरित्र।

भूखे के हितों की लड़ाई, भरे पेट लड़ रहे हैं,
ग़रीबी मिटाने के लिए, गरीब खत्म कर रहे हैं।
ख़ास जातियों के लोग, व्यवस्था पर हावी हुए,
सरकारी सुविधाओं की, बन्दरबाँट कर रहे हैं।

कब तलक जातिगत व्यवस्था को ढोया जाएगा,
कब तलक समाजवाद का, रोना रोया जाएगा?
योग्यता की बलि, सामाजिक न्याय की दुहाई,
कब तलक खेतों में, खरपतवार बोया जाएगा?

बौद्धिक सम्पदा से विहीन राष्ट्र, बंजर के समान है,
खेतों में रसायन युक्त खेती, अनाज ज़हर समान है।
सामाजिक न्याय की खोखली दलीलें अमानवीय,
वोट लालच में प्रतिभाओं का दमन, मृत्यु समान है।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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