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मयंक निशा के संसर्ग से, उदित होती नव भोर

मयंक निशा के संसर्ग से, उदित होती नव भोर

कुमार महेंद्र
श्यामल आँचल तान धरा पर,
जब रजनी का पहरा था।
मंद-मंद शशि-किरणों से तब,
चहुँ ओर उसे घेरा था।
नयनों ने नयनों से कह दी,
मन में छिपी प्रेम की डोर।
मयंक निशा के संसर्ग से, उदित होती नव भोर।।


तारों की सभा शरमाई,
चंदा का मुखड़ा मुस्काया।
निशि के नीरव एकांत में,
नेह-सुधा का रस छलकाया।
मौन अधर जब मिले परस्पर,
मिटने लगा विरह का छोर।
मयंक निशा के संसर्ग से, उदित होती नव भोर।।


सिंदूरी आभा बिखर उठी,
प्राची का अंचल मुस्काया।
मलय-पवन के मृदु झोंकों ने,
मधुर प्रणय-संदेश सुनाया।
रजनी ने जब ली अंगड़ाई,
प्रकृति चली अरुणिमा की ओर।
मयंक निशा के संसर्ग से, उदित होती नव भोर।।


ओस-कणों ने मोती बनकर,
पल्लव-पल्लव को सजाया।
पक्षी-कंठों ने प्रभाती का,
सौम्य मधुरिम राग सुनाया।
उपवन महका, कलियाँ चहकीं,
नृत्यातुर हुआ मन का मोर।
मयंक निशा के संसर्ग से, उदित होती नव भोर।।


यह मिलन नहीं केवल दो का,
यह सृष्टि-सृजन का गान है।
तम के भीतर पलता प्रतिपल,
प्रकाशमय नव प्राण है।
रात सिमटती गई धीरे-धीरे,
छँटने लगा तम घनघोर।
मयंक निशा के संसर्ग से, उदित होती नव भोर।।


आशाओं के दीप जले हैं,
स्वप्नों ने ली फिर अंगड़ाई।
बीती पीड़ा दूर हुई अब,
हँसती आई तरुण अरुणाई।
तम की टोली दूर हुई तो,
परिवेश हुआ खुशियों से सराबोर।
मयंक निशा के संसर्ग से, उदित होती नव भोर।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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