ईश्वर के कृपापात्र बनने के संकेत
डॉ राकेश कुमार आर्य
महर्षि दयानंद सरस्वती के दृष्टिकोण के अनुसार परमपिता परमेश्वर की सच्ची कृपा किसी न तो चमत्कारिक पर प्रकट होती है और न ही किसी भौतिक उपहार के रूप में हमें प्राप्त होती है। जब हम परमेश्वर की कृपा के पात्र बनते हैं तो हमारे आत्मिक जगत में आंतरिक और आध्यात्मिक परिवर्तनों की गूंज सुनाई देने लगती है। सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद जी महाराज ने स्पष्ट किया है कि परमपिता परमेश्वर पक्षपाती नहीं है। उसकी कृपा का पात्र वही व्यक्ति बनता है जो वेद के अनुकूल पुरुषार्थ करता है। वेद की आज्ञा का पालन करता है और परमेश्वर द्वारा स्थापित वेद को अपना धर्म स्वीकार करके चलता है।
सनातन वैदिक धर्म में ईश्वर को सच्चिदानंद स्वरूप, सर्वव्यापक, न्यायकारी और दयालु माना गया है। महर्षि दयानंद सरस्वती के अनुसार, ईश्वर की कृपा का अर्थ यह कतई नहीं है कि वह किसी के पापों को बिना कारण क्षमा कर दे या बिना कर्म किए किसी को सुख दे दे। यदि ऐसा माना जाएगा तो इस पर पक्षपाती हो जाएगा। ईश्वर अपनी न्याय व्यवस्था और कर्म फल व्यवस्था के अंतर्गत अपनी दया और अपनी कृपा को प्रकट करता है। कर्म करने में जीव स्वतंत्र है परंतु फल भोगने में परतंत्र है। कर्म करने की अपनी स्वतंत्रता का जीव को सदुपयोग करना चाहिए। यदि वह अपनी स्वतंत्रता का अतिक्रमण करेगा तो निश्चय ही अनिष्टकारी फल भोगना पड़ेगा। अनिष्टकारी फल से बचने के लिए कर्म करने की स्वतंत्रता के प्रति मनुष्य को सदैव ही जागरुक, सचेत और सावधान रहना चाहिए।
परमपिता परमेश्वर ने सबसे पहले कृपा तो हम पर यही की है कि उसने हमें ही वेद ज्ञान देने के लिए उपयुक्त समझा। संसार के अन्य जितने पर भी प्राणी हैं , उनमें से केवल और केवल मनुष्य को ही वेद प्रदान किए गए। वेद ज्ञान मनुष्य के लिए न केवल इस भौतिक जगत में काम आता है बल्कि परलोक में भी काम आता है। जिसका जीवन वेद की आज्ञाओं का अनुकूल होता है, वह इस संसार में रहते हुए तो आनंद भोगता ही है, परलोक में भी उसे आनंद की प्राप्ति होती है। परलोक में मिलने वाले उस आनंद को ही मोक्ष कहते हैं। जो व्यक्ति ज्ञान के इस पवित्र आलोक में अपने जीवन को ढाल लेता है वह ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है।
जब किसी साधक या भक्त पर ईश्वर की कृपा होने लगती है, तो उसके भीतर और बाहर कुछ विशेष परिवर्तन होने अनुभव होने लगते हैं। कुछ ऐसे संदेश और संकेत दिखाई देते हैं जो उसके भीतर हो रहे व्यापक परिवर्तन की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। ये संकेत पूरी तरह से तार्किक, मानसिक और व्यावहारिक होते हैं, जैसे:-
क. बुद्धि का सात्विक और पवित्र होना
वैदिक धर्म अर्थात सनातन धर्म में विश्वास रखने वाले व्यक्ति के लिए गायत्री मंत्र का विशेष महत्व है। हम सभी जानते हैं कि गायत्री मंत्र में हम परमपिता परमेश्वर से बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करने की प्रार्थना करते हैं। जब बुद्धि सन्मार्गगामिनी हो जाती है तो व्यक्ति का जीवन संतुलित हो जाता है। भ्रांतियों से मुक्त हो जाता है। उसे एक रास्ता मिल जाता है जिस पर चलना वह अपने जीवन का सौभाग्य समझने लगता है। इसी को जीवन में धर्म का उदय होना भी कहा जा सकता है। मनुष्य पर ईश्वर की कृपा का पहला और स्पष्ट संकेत उसकी बुद्धि में हो रही पवित्रता सूचक परिवर्तनों को ही माना जाना चाहिए। जब बुद्धि कुमार्ग को छोड़कर सन्मार्ग पर आने लगे सत असत के बीच विवेक कर सके, क्या हमारे लिए उपयुक्त है क्या अनुपयुक्त है ? क्या करणीय है , क्या अकरनीय है ? इसके बीच विवेक कर सके, किसके करने से हमारे जीवन का कल्याण होगा और किसके करने से अकल्याण होगा ? इसके बारे में हमें सही-सही सूचना देने लगे तब समझना चाहिए कि हम पर ईश्वर की कृपा हो रही है। पवित्र बुद्धि धर्म के अनुसार ही आचरण करने के लिए प्रेरित करती है,वेद की आज्ञाओं का यथावत पालन करने के लिए हमारा मार्गदर्शन करती है।
ख. अंतःकरण में निर्भयता और शांति
यजुर्वेद में कहा गया है कि जो ईश्वर की शरण में है, वह कभी भयभीत नहीं होता। इसके लिए व्यक्ति के हृदय में उत्साहित का संचार होता है। शरीर में कमजोरी होने के उपरांत भी वह सब कुछ कर गुजरने की सोचने लगता है। वृद्धावस्था में भी उसे यौवन का उत्साह दिखाई देता है। उसके भीतर से मृत्यु का भय मिट जाता है। मृत्यु को वह एक पड़ाव समझने लगता है, एक पर्व की भांति मानने लगता है।
ऐसे साधक के भीतर एक अभूतपूर्व आत्मिक शांति और संतोष का उदय होता है। जिसमें वह आनंद की अनुभूति करता है। आनंद के सागर में गोते लगाता है। उस आनंद के समक्ष संसार के सारे रस, सारे आनंद, सारे सुख उसे फीके नजर आते हैं।
मनवा मीठी तान का जब होवे आभास।
मानो अब होने लगा कुछ परिवर्तन खास।।
ग. वेदों और सत्य विद्या के प्रति अनुराग
संसार में मनुष्य आता है, परंतु यहां पर आकर वह अविद्या में भटकता रहता है। अज्ञान का आवरण उसे अपने आप से बाहर निकलने नहीं देता। उसके हृदय देश में कभी ज्ञान के प्रकाश की अनुभूति नहीं होती। परंतु जब यह अंधकार हटने लगे, भटकाव रुकने लगे , ज्ञान के प्रकाश की अनुभूति होने लगे , तब समझना चाहिए कि ईश्वर की कृपा का प्राकट्य हो रहा है। ऋषि दयानंद के अनुसार, जिस मनुष्य का मन असत्य संशय, अंधविश्वास और पाखंड से हटकर शुद्ध वैदिक सिद्धांतों, उपनिषदों और सत्य विद्या के अध्ययन में रमने लगे, समझना चाहिए कि उस पर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है।
ईश्वर की कृपा हुई हुआ दूर अज्ञान।
शुभचिंतन में मन लगा जीवन हुआ महान।।
घ. परोपकार और दया की भावना का जागना
ईश्वर सर्वहितकारी है। उसने जीवों के कल्याण के लिए ही संसार रचा है। जीवों के कल्याण के लिए ही हर पल काम करता है। जब उसकी कृपा आत्मा पर बरसती है, तो मनुष्य के भीतर से स्वार्थ की भावना समाप्त होने लगती है। स्वार्थ के स्थान पर उसके भीतर परमार्थ के भाव जागृत होने लगते हैं लोक कल्याण के लिए जैसे परमपिता परमेश्वर हर पल कार्यरत रहते हैं ,वैसे ही वह स्वयं भी अर्थात भक्त भी लोककल्याण की भावना से प्रेरित होकर उसी में समर्पित हो जाता है। इसी प्रकार के कार्यों में लग जाना ही परमेश्वर का युवराज हो जाना होता है। वह प्राणिमात्र के कल्याण, परोपकार, अनाथों की सेवा और जीव दया में आनंद का अनुभव करने लगता है। इसी को जीवन में दिव्यता का प्रकट हो जाना कहा जाता है तथा जब आपके भीतर इस प्रकार के भाग जागृत होने लगें , तब आपको समझना चाहिए कि मेरे भीतर भी दिव्यता का विकास हो रहा है। मेरा जीवन आदरणीय बनता जा रहा है। मैं लोक के लिए उपयोगी बन चुका हूं और मेरे जीवन का जो उद्देश्य था अर्थात जो मेरा स्वधर्म था वह मेरे द्वारा निष्पादित होने लगा है।
जीवन में परिवर्तन की प्रक्रिया: कैसे बदलता है भक्त का स्वरूप?
परमेश्वर की कृपा प्राप्त होने पर मनुष्य के जीवन का कायाकल्प हो जाता है। यह परिवर्तन क्रमिक और स्थायी होता है, जिसे तीन स्तरों पर समझा जा सकता है:
1. वैचारिक परिवर्तन
हमारे जीवन में सब ओर नकारात्मकता छाई रहती है। परमेश्वर की भक्ति अर्थात उसकी आज्ञा का यथावत पालन करने पर हमारे भीतर से नकारात्मकता दूर होने लगती है। मैं कुछ नहीं कर सकता, मैं तो मर गया, मैं तो हार गया, मैं तो थक गया, मेरा जीवन बहुत छोटा है, मैं तो अब कोई विशेष कार्य नहीं कर सकता आदि कई प्रकार की नकारात्मकताऐं हमारे जीवन को दुष्प्रभावित करती हैं। लोगों के विषय में भी हमारा चिंतन चलता रहता है कि कोई किसी का नहीं है, सब स्वार्थ के हैं । परिवार के लोगों को लेकर भी हम कई प्रकार की चिंताएं करते रहते हैं। कोई हमारे साथ छोटा-मोटा दुर्व्यवहार कर दे तो उसको लेकर हम बात का बतंगड़ बना देते हैं। उसी पर अपना चिंतन केंद्रित किए रहते हैं। उससे बाहर निकलने का नाम नहीं लेते । इस प्रकार के नकारात्मक चिंतन से हमारी ऊर्जा गलत स्थान पर जाकर प्रयोग होती है। परमेश्वर की भक्ति से काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे मानसिक विकार धीमे-धीमे कमजोर होने लगते हैं। नकारात्मकता के स्थान पर सकारात्मकता प्रवेश करने लगती है। भक्त हर परिस्थिति में ईश्वर की न्याय व्यवस्था को देखता है, जिससे वह दुखों में टूटता नहीं और सुखों में अहंकारी नहीं होता।
2. व्यावहारिक परिवर्तन
महर्षि दयानंद ने 'सत्यार्थ प्रकाश' के नियमों में लिखा है कि सर्वथा सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिए। कृपापात्र व्यक्ति का व्यवहार छल-कपट से मुक्त हो जाता है। सहज सरल व्यवहार करने में उसे आनंद आने लगता है। उसकी वाणी में मिठास आने लगती है। विखंडनवादी सोच से वह दूर हो जाता है। इसके स्थान पर वह सब को साथ लेकर चलने में आनंद की अनुभूति करने लगता है। नेतृत्व करते समय वह प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान का ध्यान रखता है। इस बात का ध्यान रखना है कि प्रत्येक व्यक्ति मुझे अपने आपसे जुड़ा हुआ अनुभव करे। इस प्रकार वह सबका होकर चले और सब को साथ लेकर चले। जब इस प्रकार का परिवर्तन जीवन में आने लगता है तब ईश्वर की कृपा को अनुभव करना चाहिए। व्यक्ति का जीवन अनुशासित हो जाता है। वह यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) को अपने दैनिक जीवन में उतारने लगता है।
3. आत्मिक परिवर्तन
मनुष्य स्वयं को शरीर न मानकर 'अजर, अमर, अविनाशी आत्मा' के रूप में अनुभव करने लगता है। वह साक्षी भाव से कार्यों का निष्पादन करने लगता है। साक्षी भाव से या दृष्टा भाव से काम करने की इस प्रवृत्ति को ही श्री कृष्ण जी ने निष्काम कर्म का है। ऐसा भक्त संसार में रहकर भी संसार की कीचड़ में रमता नहीं है। प्रार्थना और उपासना के समय उसे अपने हृदय देश में ईश्वर की सर्वव्यापकता का सघन अहसास होने लगता है।
आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने मध्यकाल में फैली रूढ़ियों और गलत धारणाओं का खंडन करते हुए कृपा के सिद्धांत को पुनः वैदिक रूप में स्थापित किया।ऋषि दयानंद कहते थे कि आलसी और पुरुषार्थहीन व्यक्ति पर ईश्वर कभी कृपा नहीं करता। जैसे सूर्य का प्रकाश सबके लिए है, लेकिन जो अपनी खिड़कियां बंद रखेगा, उसे अंधेरा ही मिलेगा। इसी प्रकार, जो वेदानुकूल पुरुषार्थ करता है, ईश्वर की कृपा रूपी प्रकाश स्वतः उसके जीवन को आलोकित कर देता है। महर्षि दयानंद ने स्पष्ट किया कि गंगा स्नान, तीर्थ यात्रा या किसी गुरु के आशीर्वाद से पाप कर्मों का फल नष्ट नहीं होता। ईश्वर न्यायकारी है, वह कर्म का फल अवश्य देता है। परंतु, जब मनुष्य सच्चे दिल से पश्चाताप करता है और भविष्य में पाप न करने का दृढ़ संकल्प लेता है, तो ईश्वर उसे आगे बढ़ने की आत्मिक शक्ति (कृपा) देता है।
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