Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

हदें

हदें

हदें निर्धारित हैं
नदी की, नहर की,
तालाब व समंदर की,
और स्त्री-पुरुष की भी।


मगर जब टूटती हैं हदें
बरसात में नदी-नहर
पोखर या समंदर की
आती है प्रलय और
कर जाती है सर्वस्व विनाश।


और बरसात के बाद
लौट जाते है वापस
अपनी हदों के बीच
नदी, नहर, पोखर समंदर।


मगर टूटती हैं जब
स्त्री और पुरुष की हदें
ले जाती हैं सर्वनाश की और
समाज को व स्वयं को भी।


विडम्बना ! इसके बाद
कभी नहीं लौट पाती
हदों के दरमियां
हमारी हदें
और झूठे दम्भ में
हम खो देते हैं
अपना अस्तित्व।

डॉ अ कीर्तिवर्धन
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ