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कैमूर परिभ्रमण : मुण्डेश्वरी की आस्था से तेल्हार की जलधारा तक

कैमूर परिभ्रमण : मुण्डेश्वरी की आस्था से तेल्हार की जलधारा तक

  • 2000 वर्ष पुराने जीवित मंदिर, तेल्हार कुण्ड, तेल्हार झरना, मुसहरवा बाबा और सुअरा नदी के बीच इतिहास, अध्यात्म और प्रकृति की अद्भुत यात्रा

सत्येन्द्र कुमार पाठ

27 सितंबर 2026। विश्व पर्यटन दिवस। पूरी दुनिया इस दिन पर्यटन की संभावनाओं, ऐतिहासिक धरोहरों, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विरासत की चर्चा कर रही थी। ऐसे अवसर पर मन में एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है—जब दुनिया घूमने की बात हो रही है तो हम अपने ही देश, अपने ही प्रदेश और अपनी ही धरती के उन अनमोल स्थलों को कितना जानते हैं, जिनकी गोद में इतिहास, अध्यात्म, लोकविश्वास और प्रकृति एक साथ सांस लेते हैं? यदि घूमना है तो अपना बिहार घूमिए, अपना कैमूर घूमिए। कैमूर केवल एक जिला नहीं, बल्कि पहाड़, जंगल, जलप्रपात, नदी, पुरातत्व, लोकदेवता और सनातन आस्था का ऐसा जीवंत संसार है, जिसे जितना पढ़ा जाए उतना ही वह अपने भीतर छिपी नई कथा खोलता जाता है।

विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर कैमूर के भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ के निकट कैमूर पर्वत समूह की मुण्डेश्वरी श्रृंखला से लेकर अधौरा प्रखंड के तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरने तक का हमारा यह परिभ्रमण केवल एक यात्रा नहीं था। यह इतिहास के पन्नों को छूने, लोकविश्वास को समझने, प्रकृति की नाड़ी को सुनने और बिहार की सांस्कृतिक स्मृति को अपनी आंखों से देखने का अवसर था। इस ऐतिहासिक यात्रा में मेरे साथ जिला जीविका, औरंगाबाद के प्रशिक्षण अधिकारी प्रवीण कुमार पाठक थे। मैं स्वयं साहित्यकार, इतिहासकार और बाल साहित्य में ‘सृजन श्रेष्ठ’ सम्मान से सम्मानित होने के नाते इस यात्रा को केवल पर्यटक की दृष्टि से नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति के एक जिज्ञासु विद्यार्थी की दृष्टि से देख रहा था।

हमारी यात्रा के दो प्रमुख पड़ाव थे—पहला भगवानपुर प्रखंड की मुण्डेश्वरी पहाड़ी पर स्थित माँ मुण्डेश्वरी धाम और दूसरा अधौरा प्रखंड का तेल्हार कुण्ड एवं तेल्हार झरना। लेकिन इन दोनों स्थलों के बीच यात्रा करते हुए एक तीसरी धारा लगातार हमारे साथ चलती रही—कैमूर की सुअरा नदी। पहाड़ से उतरती, गांवों को सींचती और आगे दुर्गावती नदी में समाहित होती यह नदी हमें बार-बार यह समझाती रही कि किसी भी पर्यटन स्थल को उसके व्यापक प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

कैमूर बिहार के पश्चिमी भूभाग का महत्वपूर्ण जिला है। ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र रोहतास से जुड़ा रहा और 1991 में स्वतंत्र जिला बना। कैमूर की पर्वत श्रेणियां विंध्य पर्वत तंत्र के पूर्वी विस्तार से संबंधित मानी जाती हैं। इन पहाड़ियों का भूगोल केवल पत्थरों और चट्टानों का भूगोल नहीं है; इनके भीतर हजारों वर्षों की मानवीय स्मृतियां, धार्मिक परंपराएं, वन-संस्कृति और जल-स्रोत छिपे हुए हैं।

इन्हीं पहाड़ियों की मुण्डेश्वरी श्रृंखला पर रामगढ़ के निकट स्थित है माँ मुण्डेश्वरी का प्राचीन मंदिर। स्थानीय परंपरा और उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर इसे भारत के अत्यंत प्राचीन जीवित मंदिरों में गिना जाता है। ‘जीवित मंदिर’ कहने का आशय यह है कि यह केवल पुरातात्विक अवशेष नहीं, बल्कि आज भी नियमित पूजा-अर्चना वाला सक्रिय धार्मिक स्थल है।

मुण्डेश्वरी तक पहुंचने के लिए पहाड़ी पर चढ़ना अपने आप में एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है। नीचे से ऊपर तक लगभग 510 पक्की सीढ़ियां हैं। सीढ़ियों के बीच विश्राम के लिए चबूतरे बनाए गए हैं। युवा श्रद्धालु सीढ़ियों से ऊपर जाते हैं, जबकि बुजुर्गों, दिव्यांग श्रद्धालुओं तथा सामान के लिए सड़क मार्ग की सुविधा है। हम लोग भी द्विचक्रीय वाहन से ऊपर पहुंचे। हालांकि सड़क से पहुंचना सुविधाजनक है, लेकिन सीढ़ियों से चढ़ने में जो अनुभव मिलता है वह अलग ही है। हर सीढ़ी मानो मनुष्य को बाहरी संसार से भीतर की यात्रा की ओर ले जाती है।

चढ़ाई के दौरान सांस फूलती है, शरीर थकता है, लेकिन जैसे-जैसे मंदिर निकट आता है, भीतर की उत्सुकता बढ़ती जाती है। मंदिर के समीप पहुंचकर लगता है कि यह यात्रा केवल पहाड़ चढ़ने की नहीं थी; यह स्वयं से मिलने की यात्रा भी थी।

मुण्डेश्वरी मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और स्थापत्य पक्ष इसका गर्भगृह है। यहां देवी मुण्डेश्वरी और पंचमुखी शिव की उपस्थिति साथ-साथ दिखाई देती है। गर्भगृह में काले पत्थर की चतुर्भुजी देवी की प्रतिमा महिषासुरमर्दिनी स्वरूप से संबद्ध मानी जाती है। देवी के निकट पंचमुखी शिवलिंग विराजमान है। इस सह-अस्तित्व में शक्ति और शिव की भारतीय दार्शनिक अवधारणा का सुंदर प्रतीक दिखाई देता है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शिव को चेतना और शक्ति को ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। इसलिए मुण्डेश्वरी का गर्भगृह भक्त के सामने किसी एकांगी साधना के बजाय शिव और शक्ति की संयुक्त उपासना का भाव उपस्थित करता है।

पंचमुखी शिव की अवधारणा भी अत्यंत गहरी है। चार दिशाओं में स्थित मुख और ऊपर की ओर स्थित पांचवें मुख को विभिन्न आध्यात्मिक अवधारणाओं से जोड़ा जाता है। स्थानीय धार्मिक व्याख्या में इन्हें चार वेदों और मोक्ष की दिशा का प्रतीक माना जाता है। यहां आकर एक सहज भाव उभरता है—शक्ति की उपासना शिव से अलग नहीं और शिव की साधना शक्ति से पृथक नहीं। यही भारतीय दर्शन में अद्वैत की व्यापक अनुभूति का एक सुंदर लोक-रूप है।

मंदिर की प्राचीनता का एक महत्वपूर्ण आधार यहां मिले अभिलेख और पुरातात्विक अवशेष हैं। 20वीं सदी के प्रारंभ में पुरातत्वविद् ब्लॉख द्वारा यहां एक शिलालेख की खोज किए जाने का उल्लेख मिलता है, जिसने इस स्थल के इतिहास को प्राचीन काल से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुण्डेश्वरी के इतिहास को लेकर विभिन्न विद्वानों और परंपराओं में अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं, लेकिन इतना निर्विवाद है कि यह क्षेत्र अत्यंत प्राचीन धार्मिक-पुरातात्विक महत्व रखता है।

मंदिर की प्राचीनता को समझने के लिए इसकी स्थापत्य कला पर दृष्टि डालना भी आवश्यक है। पत्थर की संरचना, अष्टकोणीय योजना, अलंकरण और विभिन्न पाषाण प्रतिमाओं की उपस्थिति इसे सामान्य मंदिर से अलग करती है। यहां पत्थरों पर की गई नक्काशी तत्कालीन शिल्पकारों की दक्षता की कहानी कहती है। प्रवेश क्षेत्र में द्वारपालों की आकृतियां, विभिन्न देव प्रतिमाएं, अलंकरण, कमल तथा अन्य शिल्पांकन इस बात के प्रमाण हैं कि यह केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि स्थापत्य कला का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

मंदिर परिसर में नंदी की प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र है। जाली के भीतर विराजमान नंदी महाराज सीधे गर्भगृह की ओर देखते हैं। उनके ऊपर और आसपास श्रद्धालुओं द्वारा बांधी गई चुनरियां आस्था की असंख्य कहानियां सुनाती हैं। किसी ने संतान के लिए मन्नत मांगी होगी, किसी ने बीमारी से मुक्ति के लिए, किसी ने परिवार की सुख-शांति के लिए और किसी ने अपने जीवन के किसी कठिन मोड़ पर देवी के सामने अपनी प्रार्थना रखी होगी। इस दृष्टि से वहां बंधी प्रत्येक चुनरी एक मौन प्रार्थना है।

मंदिर परिसर में नारियल चढ़ाने के लिए अलग स्थान की व्यवस्था भी दिखाई देती है। श्रद्धालुओं की सुविधा और स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए नारियल वहीं फोड़ने की व्यवस्था की गई है। धार्मिक स्थलों के संरक्षण के साथ स्वच्छता का संतुलन बनाना आज के समय की बड़ी आवश्यकता है और इस प्रकार की व्यवस्था इस दिशा में उपयोगी है।

शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने की परंपरा है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना के अनुसार त्रिशूल भी चढ़ाते हैं। कहीं-कहीं जल, नारियल और त्रिशूल लोकआस्था के तीन अलग-अलग प्रतीकों के रूप में दिखाई देते हैं—जल जीवन का, नारियल समर्पण का और त्रिशूल शक्ति का प्रतीक बन जाता है।

मंदिर के सामने हवन-पूजन का कुण्ड भी है। चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। हवन की अग्नि, मंत्रोच्चार और पहाड़ी वातावरण मिलकर ऐसा आध्यात्मिक वातावरण निर्मित करते हैं जिसमें श्रद्धालु स्वयं को सामान्य दिनचर्या से अलग अनुभव करता है। स्थानीय मान्यता है कि हवन की राख को खेतों में डालने से फसल की उर्वरता बढ़ती है। ऐसी मान्यताएं स्थानीय कृषि-संस्कृति और धार्मिक आस्था के बीच संबंध को भी दर्शाती हैं।

मुण्डेश्वरी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध धार्मिक परंपराओं में अहिंसक बलि की परंपरा का उल्लेख किया जाता है। स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार बकरे को देवी के समक्ष लाकर मंत्रोच्चार के बाद अक्षत अर्पित किया जाता है और बकरा कुछ समय के लिए निश्चेष्ट हो जाता है। इसके बाद उसे जीवित छोड़ दिया जाता है। भक्त इसे देवी द्वारा बलि स्वीकार किए जाने का प्रतीक मानते हैं। इस परंपरा का उल्लेख मुण्डेश्वरी की धार्मिक पहचान के संदर्भ में लंबे समय से किया जाता रहा है। इसे किसी वैज्ञानिक निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय धार्मिक परंपरा और आस्था के रूप में समझना अधिक उचित है।

इसी प्रकार पंचमुखी शिवलिंग के प्रकाश के अनुसार अलग-अलग दिखाई देने की बात भी स्थानीय श्रद्धा का हिस्सा है। दिन के अलग-अलग समय में सूर्य के प्रकाश की दिशा और तीव्रता बदलने से पत्थर की सतह का रंग और चमक बदल सकती है; श्रद्धालु इसे शिव की लीला के रूप में अनुभव करते हैं। विज्ञान और आस्था की अपनी-अपनी भाषा है, लेकिन धार्मिक स्थल की अनुभूति केवल भौतिक व्याख्या तक सीमित नहीं होती। भक्त के लिए वह अनुभव उसकी व्यक्तिगत आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा बन जाता है।

मुण्डेश्वरी से जुड़ी एक अन्य लोकमान्यता रात में मंदिर के भीतर घंटी और शंख की ध्वनि सुनाई देने की है। पुजारी और स्थानीय श्रद्धालु इसे देवपूजन से जोड़कर देखते हैं। ऐसी लोककथाएं सदियों से धार्मिक स्थलों की सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखती हैं। इनका मूल्य मुख्यतः लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में समझना चाहिए।

मुण्डेश्वरी मंदिर की पौराणिक पहचान देवी के चंड-मुंड वध की कथा से भी जुड़ी हुई है। दुर्गा सप्तशती की कथा में शुंभ और निशुंभ के सेनापति चंड और मुंड का वर्णन मिलता है। देवी द्वारा उनके वध की कथा के आधार पर चामुंडा नाम की व्युत्पत्ति बताई जाती है। कैमूर की स्थानीय परंपरा मुण्डेश्वरी क्षेत्र को मुंड से जोड़ती है और मानती है कि इसी भूभाग में मुंड का वध हुआ था। इतिहास और पुराण के इन दो अलग-अलग आयामों का मेल कैमूर की सांस्कृतिक पहचान को विशेष बनाता है।

मुण्डेश्वरी के इतिहास से जुड़ी यात्राओं और पुरानी परंपराओं में चीनी यात्री ह्वेनसांग का नाम भी लिया जाता है। हालांकि प्राचीन यात्रावृत्तांतों की व्याख्या करते समय ऐतिहासिक स्रोतों की प्रमाणिकता और स्थल-परिचय का सावधानी से अध्ययन आवश्यक है, फिर भी कैमूर क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक महत्व की चर्चा में इस परंपरा का उल्लेख मिलता है।

समय की मार से मुण्डेश्वरी भी अछूती नहीं रही। मंदिर और इसकी प्रतिमाओं को क्षति पहुंचने की लोककथाएं प्रचलित हैं। किंतु इसके बावजूद पूजा की परंपरा बनी रही। यही निरंतरता मुण्डेश्वरी को ‘जीवित मंदिर’ की अनुभूति देती है। आधुनिक काल में संरक्षण की दिशा में सरकारी प्रयास हुए और इसे संरक्षित स्मारक तथा पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने पर भी ध्यान दिया गया। सड़क संपर्क ने इसकी पहुंच को व्यापक बनाया है।

मुण्डेश्वरी की यात्रा के बाद हमारा अगला पड़ाव था अधौरा प्रखंड का तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना। मुण्डेश्वरी से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी का यह मार्ग कैमूर के प्राकृतिक सौंदर्य की एक अलग दुनिया खोलता है। अधौरा अपनी ऊंचाई, जंगलों और दुर्गम भौगोलिक स्वरूप के कारण बिहार के विशिष्ट पर्वतीय क्षेत्रों में गिना जाता है। कभी-कभी इसे स्थानीय पर्यटन साहित्य में ‘बिहार का शिमला’ भी कहा जाता है। इस उपमा का उद्देश्य वहां की पहाड़ी जलवायु और प्राकृतिक परिवेश की ओर ध्यान आकर्षित करना है।

तेल्हार कुण्ड कैमूर की प्रकृति का अद्भुत उपहार है। पहाड़ी क्षेत्र में जल के संचय से बना यह प्राकृतिक जलकुण्ड स्थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। कुण्ड के आगे जलधारा नीचे गिरकर तेल्हार झरने का रूप लेती है। वर्षा ऋतु में झरने का स्वरूप अत्यंत प्रभावशाली हो जाता है। चट्टानों से गिरता हुआ पानी, चारों ओर हरियाली, बादलों से ढकी पहाड़ियां और पानी की गर्जना—यह दृश्य किसी चित्रकार की कल्पना जैसा लगता है।

तेल्हार कुण्ड से जुड़ी पांडवकालीन लोककथा भी प्रचलित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडव इस क्षेत्र में आए थे और भीम ने अपने गदा प्रहार से कुण्ड का निर्माण किया था। इसी कारण इसे कहीं-कहीं भीम कुण्ड भी कहा जाता है। पास की एक गुफा को भी लोकपरंपरा में भीम की गुफा कहा जाता है। इतिहास की दृष्टि से ऐसी कथाओं की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन लोकस्मृति में उनका महत्व कम नहीं होता। ये कथाएं किसी स्थान को लोगों के भावनात्मक भूगोल से जोड़ती हैं।

तेल्हार क्षेत्र में एक और लोकआस्था हमारा ध्यान आकर्षित करती है—मुसहरवा बाबा का मंदिर। वहां स्थानीय परंपरा में बीड़ी को प्रसाद के रूप में अर्पित करने और भक्तों द्वारा बीड़ी ग्रहण करने की प्रथा देखने को मिलती है। आधुनिक स्वास्थ्य दृष्टि से धूम्रपान के नुकसान सर्वविदित हैं, इसलिए इस परंपरा को धार्मिक-लोक सांस्कृतिक प्रथा के रूप में समझना चाहिए, स्वास्थ्य संबंधी अनुकरणीय व्यवहार के रूप में नहीं। फिर भी लोकदेवताओं की उपासना किस प्रकार स्थानीय समुदायों के जीवन और विश्वास से जुड़ी होती है, मुसहरवा बाबा का स्थल उसका एक अनोखा उदाहरण है।

तेल्हार से आगे बढ़ते हुए प्रकृति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है—जल। और इसी जल से जुड़ती है कैमूर की सुअरा नदी।

स्थानीय रूप से सुअरा, सुवरा या सुवरन नामों से पहचानी जाने वाली यह मौसमी नदी कैमूर के पहाड़ी भूगोल की एक महत्वपूर्ण जलधारा है। इसके उद्गम क्षेत्र को तेल्हार कुण्ड और आसपास की पहाड़ियों से जोड़कर देखा जाता है। पहाड़ों से रिसता जल, झरने, बरसाती नाले और छोटी धाराएं मिलकर आगे नदी का रूप लेते हैं। बरसात में यही छोटी धाराएं तेज प्रवाह में बदल जाती हैं और कैमूर की पहाड़ियों को जीवन प्रदान करती हैं।

सुअरा नदी का महत्व केवल भौगोलिक नहीं है। इसके किनारे बसे गांवों की कृषि, स्थानीय जल-संसाधन और ग्रामीण जीवन इससे जुड़े हैं। एक छोटी मौसमी नदी होने के बावजूद ऐसी जलधाराएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि सुअरा के संरक्षण को केवल नदी संरक्षण नहीं, बल्कि कैमूर के ग्रामीण भविष्य से जोड़कर देखना चाहिए।

नदी की यात्रा पहाड़ों से मैदान की ओर होती है। अधौरा के वन-पहाड़ी क्षेत्र से निकलकर यह भगवानपुर और भभुआ क्षेत्र की ओर बढ़ती है तथा आगे दुर्गावती नदी तंत्र से जुड़ती है। अंततः यह व्यापक गंगा नदी प्रणाली का हिस्सा बन जाती है। इस दृष्टि से तेल्हार के छोटे से जलकुण्ड से निकलने वाली धारा का संबंध अंततः बिहार के विशाल नदी तंत्र से जुड़ता है।

यात्रा के दौरान नदी की धारा के किनारे बैठना एक अलग अनुभव था। पहाड़ी चट्टानों से टकराकर बहता पानी किसी वाद्य की तरह सुनाई देता है। उसकी कल-कल में पहाड़ का संगीत है। वहीं गुफा की निस्तब्धता हमें हजारों वर्षों की मौन स्मृति से जोड़ती है। झरने की गर्जना और नदी की मधुर ध्वनि—दोनों मिलकर कैमूर के प्राकृतिक व्यक्तित्व को सामने लाते हैं।

सुअरा नदी के संरक्षण का प्रश्न आज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छोटी नदियां बड़े जल संकट के समय स्थानीय जीवन की आधारशिला बनती हैं। यदि पहाड़ियों पर वनों का क्षरण बढ़ता है, जलस्रोतों का अतिक्रमण होता है, वर्षाजल का संचयन नहीं होता और नदी में प्रदूषण बढ़ता है, तो उसका प्रभाव केवल नदी पर नहीं बल्कि किसानों, पशुपालकों, ग्रामीण बस्तियों और जैव विविधता पर भी पड़ता है। इसलिए कैमूर में पर्यटन विकास के साथ जल-संरक्षण और नदी पुनर्जीवन को समान महत्व देना आवश्यक है।

कैमूर में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। मुण्डेश्वरी केवल धार्मिक पर्यटन का केंद्र नहीं है। यहां धार्मिक पर्यटन, पुरातात्विक पर्यटन, आध्यात्मिक पर्यटन, प्रकृति पर्यटन, जल पर्यटन, ग्रामीण पर्यटन और इको-टूरिज्म—सभी को विकसित किया जा सकता है। मुण्डेश्वरी, तेल्हार कुण्ड, तेल्हार झरना, सुअरा नदी और अन्य प्राकृतिक स्थलों को एक समेकित पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए तो बिहार के पर्यटन मानचित्र पर कैमूर की पहचान और मजबूत हो सकती है।

इसके लिए केवल सड़क बनाना पर्याप्त नहीं होगा। स्वच्छता, सुरक्षित पैदल मार्ग, संकेतक बोर्ड, प्रशिक्षित स्थानीय गाइड, प्राथमिक चिकित्सा, पेयजल, शौचालय, कचरा प्रबंधन, पार्किंग, आपातकालीन सेवाएं और स्थानीय संस्कृति की जानकारी देने वाले सूचना केंद्र भी आवश्यक होंगे। स्थानीय युवाओं और महिलाओं को गाइड, होम-स्टे, हस्तशिल्प, स्थानीय खाद्य पदार्थ और पर्यटन सेवाओं से जोड़कर पर्यटन को स्थानीय रोजगार का माध्यम बनाया जा सकता है।

मुण्डेश्वरी की प्रत्येक चुनरी, नंदी की प्रत्येक माला, मंदिर की प्रत्येक पाषाण नक्काशी, तेल्हार की प्रत्येक चट्टान, मुसहरवा बाबा की प्रत्येक लोकपरंपरा और सुअरा की प्रत्येक जलधारा कैमूर की कहानी का एक अध्याय है। पर्यटन का अर्थ केवल किसी स्थान पर जाकर तस्वीर खींचना नहीं, बल्कि उस स्थान की आत्मा को समझना भी है।

आज जब पर्यटन तेजी से व्यापार और मनोरंजन का माध्यम बन रहा है, तब कैमूर हमें पर्यटन का एक दूसरा अर्थ भी बताता है—विरासत से संवाद। यहां पत्थर बोलते हैं, पानी गाता है, जंगल सांस लेते हैं और लोकविश्वास पीढ़ियों से अपनी स्मृतियां आगे बढ़ाता है।

मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ियों ने शरीर को थकाया, लेकिन गर्भगृह में माता मुण्डेश्वरी और पंचमुखी शिव के दर्शन ने मन को एक अद्भुत शांति दी। हवन कुण्ड की अग्नि ने भीतर की श्रद्धा को प्रज्वलित किया। नंदी के सामने बंधी चुनरियों ने मनोकामनाओं की अनगिनत कथाएं सुनाईं। फिर जब हम तेल्हार की ओर बढ़े तो पहाड़ी हवा ने जैसे यात्रा का दूसरा अध्याय खोल दिया। तेल्हार कुण्ड के जल ने बताया कि पहाड़ों के भीतर जीवन का कितना बड़ा भंडार छिपा है और झरने ने यह संदेश दिया कि प्रकृति को केवल देखने की वस्तु नहीं, संरक्षण की जिम्मेदारी भी समझना चाहिए।

इस यात्रा में मुसहरवा बाबा का लोकविश्वास मिला, सुअरा की धारा मिली, पहाड़ी गुफाएं मिलीं, झरना मिला और गांवों की जीवनधारा मिली। तभी लगा कि कैमूर को केवल ‘मुण्डेश्वरी मंदिर’ कहकर समझना उसके साथ अन्याय होगा। कैमूर एक संपूर्ण सांस्कृतिक-प्राकृतिक परिदृश्य है।

आज 27 सितंबर 2026 को विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर किया गया यह परिभ्रमण मेरे जीवन के अविस्मरणीय यात्रानुभवों में से एक रहेगा। इतिहासकार की दृष्टि से यहां अतीत दिखाई दिया, साहित्यकार की दृष्टि से प्रकृति कविता बनकर सामने आई और एक सामान्य यात्री की दृष्टि से बिहार की मिट्टी के प्रति गर्व की अनुभूति हुई।

मुण्डेश्वरी की पहाड़ी पर चढ़ते हुए लगा—

“मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ियां,
चढ़ते-चढ़ते सांस फूली,
पर माता के दरबार में पहुंचते ही
सारी थकान भूली।”

तेल्हार कुण्ड के किनारे प्रकृति ने कहा—

“रुक जाओ दो घड़ी,
पहाड़ की भाषा सुनो,
जल की धुन पहचानो,
और कैमूर को केवल देखो मत—
उसे महसूस करो।”

सुअरा नदी की कल-कल में एक और संदेश सुनाई दिया—

“मैं छोटी हूं, पर जीवन देती हूं;
मैं मौसमी हूं, पर स्मृति स्थायी है;
मुझे बचाओगे तो खेत बचेंगे,
जंगल बचेंगे, गांव बचेंगे
और कैमूर की आने वाली पीढ़ियां बचेंगी।”

वास्तव में कैमूर का पर्यटन केवल मंदिर और झरना नहीं है। यह मुण्डेश्वरी की आस्था, पंचमुखी शिव की साधना, नंदी की प्रतीक्षा, चुनरियों की मनोकामना, हवन की अग्नि, तेल्हार के जल, झरने की गर्जना, मुसहरवा बाबा की लोकपरंपरा और सुअरा नदी की जीवनधारा का समन्वित संसार है।

यदि बिहार को पर्यटन की दृष्टि से नई पहचान देनी है तो हमें केवल बड़े शहरों और प्रसिद्ध स्थलों तक सीमित नहीं रहना होगा। कैमूर जैसे जिलों की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को सामने लाना होगा। यहां की पहाड़ियों, नदियों, झरनों, मंदिरों, गुफाओं और लोकदेवताओं को सुरक्षित रखते हुए पर्यटन की ऐसी अवधारणा विकसित करनी होगी जिसमें प्रकृति भी बचे, संस्कृति भी बचे और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार भी पैदा हो।

कैमूर की यात्रा समाप्त नहीं हुई है। यह तो केवल एक शुरुआत है। क्योंकि इस धरती के हर पत्थर में इतिहास है, हर पहाड़ी में कथा है, हर जलधारा में जीवन है और हर मंदिर की घंटी में सदियों की स्मृति।

मुण्डेश्वरी हमें आस्था देती है।
तेल्हार हमें प्रकृति देता है।
मुसहरवा बाबा हमें लोकजीवन से जोड़ते हैं।
सुअरा नदी हमें जल का महत्व समझाती है।
और पूरा कैमूर हमें यह बताता है कि बिहार की धरती किसी भी मायने में पर्यटन की दृष्टि से पीछे नहीं है।

आइए, इस विश्व पर्यटन दिवस पर केवल विदेशों और दूसरे राज्यों की यात्रा की योजना न बनाएं। अपने बिहार को जानें। अपनी धरती को देखें। अपनी विरासत को समझें। और कैमूर जाएं—जहां इतिहास पहाड़ों पर लिखा है, अध्यात्म मंदिरों में जीवित है और प्रकृति आज भी अपनी सबसे सुंदर भाषा में बोलती है।

जय माँ मुण्डेश्वरी।
जय तेल्हार कुण्ड।
जय मुसहरवा बाबा।
जय सुअरा नदी।
जय कैमूर।
जय बिहार।

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