झारखंड में करम पर्व : प्रकृति, परंपरा और भाई-बहन के स्नेह का लोकपर्व

डॉ. अनमोल कुमार
झारखंड की पहचान केवल अपने जंगलों, पहाड़ों और खनिज संपदा से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोकसंस्कृति और प्रकृति से गहरे जुड़ी जीवन-पद्धति से भी है। यहां प्रकृति जीवन का आधार होने के साथ-साथ आस्था और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। वृक्ष, नदी, पहाड़, खेत और जलस्रोत यहां के लोकजीवन में केवल संसाधन नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक हैं। इसी प्रकृति-केंद्रित जीवनदर्शन की सशक्त अभिव्यक्ति है करम पर्व।
करम पर्व झारखंड के प्रमुख लोकपर्वों में से एक है और विशेष रूप से आदिवासी समाज में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह सामान्यतः भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों में इसकी पूजा-पद्धति तथा लोकमान्यताओं में कुछ अंतर अवश्य मिलता है, लेकिन इसके मूल में प्रकृति के प्रति सम्मान, कृषि-समृद्धि, भाई-बहन के स्नेह और सामुदायिक एकता की भावना समान रूप से दिखाई देती है।
करम पर्व को समझना झारखंड के लोकजीवन को समझने जैसा है। करम वृक्ष की डाल इस पर्व का प्रमुख प्रतीक है। उसे विधिपूर्वक गांव में लाकर अखरा या पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है और सामूहिक रूप से उसकी पूजा की जाती है। इसके माध्यम से अच्छी फसल, परिवार की सुख-समृद्धि और प्रकृति की अनुकूलता की कामना की जाती है।
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
करम पर्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसका प्रकृति-केंद्रित स्वरूप है। आदिवासी जीवनदर्शन में मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई कृत्रिम दूरी नहीं है। जंगल जीवन देता है, नदी पोषण करती है, खेत अन्न देते हैं और वृक्ष जीवन की निरंतरता के प्रतीक हैं। इसलिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञता यहां की लोकपरंपराओं में सहज रूप से दिखाई देती है।
करम वृक्ष की पूजा इसी भावना का प्रतीक है। यह परंपरा आधुनिक पर्यावरण विमर्श से बहुत पहले से मनुष्य को प्रकृति के साथ संतुलित संबंध का संदेश देती रही है। आज जब जंगलों की कटाई, जलस्रोतों के प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन की चुनौतियां सामने हैं, तब करम पर्व का प्रकृति-सम्मान का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो उठता है।
कृषि और समृद्धि का पर्व
झारखंड का पारंपरिक ग्रामीण जीवन कृषि और वन-संपदा पर आधारित रहा है। इसलिए करम पर्व का कृषि-चक्र से भी गहरा संबंध है। वर्षा, मिट्टी, बीज और मौसम की अनुकूलता किसान की मेहनत को सफल बनाती है। भादो के समय मनाया जाने वाला यह पर्व अच्छी फसल और परिवार की खुशहाली की आशा से जुड़ा है।
किसान के लिए खेत केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि उसके परिवार के भविष्य की उम्मीद है। करम पर्व इसी उम्मीद को सामूहिक उत्सव में बदल देता है। पूजा के माध्यम से प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है और आने वाले दिनों के लिए समृद्धि की कामना की जाती है।
भाई-बहन के पवित्र संबंध का पर्व
करम पर्व का एक अत्यंत भावनात्मक पक्ष भाई-बहन के संबंध से जुड़ा है। विशेष रूप से युवतियां और कुंवारी बहनें इस अवसर पर उपवास रखकर अपने भाइयों की लंबी आयु, स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं।
भारतीय लोकजीवन में भाई-बहन का रिश्ता प्रेम, विश्वास और संरक्षण का प्रतीक रहा है। करम पर्व इस रिश्ते को अपनी विशिष्ट लोकपरंपरा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। करम गीतों में बहन के मन की यही कामना स्वर पाती है—
“करम राजा भाइयों को बनाए रखिहो...”
इन शब्दों में बहन की सहज प्रार्थना और भाई के प्रति उसका गहरा स्नेह दिखाई देता है। यही भाव इस पर्व को पारिवारिक संवेदना से जोड़ता है।
उपवास से अखरा तक
करम पर्व की तैयारी में भी सामुदायिक सहभागिता दिखाई देती है। पर्व के दिन युवतियां और महिलाएं परंपरा के अनुसार उपवास रखती हैं। शाम होते-होते गांव का वातावरण उत्सवमय हो जाता है। करम की डाली को विधिपूर्वक लाकर अखरा में स्थापित किया जाता है।
इसके बाद गीत-संगीत और नृत्य का सिलसिला आरंभ होता है। करम डाली के चारों ओर लोग एकत्र होते हैं और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की लय पर करम गीत तथा झूमर नृत्य प्रस्तुत करते हैं। रात भर चलने वाला यह सामूहिक उत्सव झारखंड की जीवंत लोकसंस्कृति की अनूठी झलक प्रस्तुत करता है।
अखरा : केवल नृत्य का स्थान नहीं
झारखंड के पारंपरिक समाज में अखरा का विशेष महत्व है। यह केवल नृत्य और मनोरंजन का स्थान नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक संवाद का केंद्र रहा है। लोकगीत, नृत्य, उत्सव और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से अखरा पीढ़ियों को एक-दूसरे से जोड़ता है।
करम पर्व के दौरान अखरा विशेष रूप से जीवंत हो उठता है। यहां बच्चे, युवा और बुजुर्ग अपनी-अपनी भूमिका के साथ शामिल होते हैं। सामूहिक गीत और नृत्य सामाजिक दूरी को कम करते हैं और समुदाय में एकता की भावना मजबूत करते हैं।
करम गीत : लोकस्मृति की विरासत
करम पर्व के गीत इसकी आत्मा हैं। इनमें प्रकृति, कृषि, परिवार, प्रेम और लोकविश्वास के अनेक रंग दिखाई देते हैं। इन गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पुस्तकों से अधिक लोकस्मृति में जीवित रहे हैं।
एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को गीत सिखाती है और इस प्रकार सांस्कृतिक विरासत आगे बढ़ती रहती है। करम गीतों में जीवन के अनुभव और लोकसमाज की संवेदनाएं सहज भाषा में अभिव्यक्त होती हैं। इसलिए इन्हें केवल मनोरंजन का साधन मानना इनके सांस्कृतिक महत्व को सीमित करना होगा।
लोककथा और जीवन-मूल्य
करम पर्व से जुड़ी अनेक लोककथाएं विभिन्न समुदायों में प्रचलित हैं। इनके स्वरूप में क्षेत्रानुसार भिन्नता मिलती है, लेकिन इनमें प्रायः परिश्रम, सदाचार, प्रकृति के सम्मान, पारिवारिक जिम्मेदारी और सामुदायिक सहयोग जैसे जीवन-मूल्यों को महत्व दिया गया है।
लोककथाएं समाज की मौखिक पाठशाला रही हैं। इनके माध्यम से नई पीढ़ी केवल कथा नहीं सुनती, बल्कि अपने समाज के मूल्य और जीवन-दर्शन भी सीखती है।
विसर्जन और प्रकृति में वापसी
पूजा और उत्सव के बाद करम डाली के विसर्जन की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। नदी, तालाब या अन्य जलस्रोत में विसर्जन के माध्यम से करम की डाली को पुनः प्रकृति को समर्पित किया जाता है।
इस परंपरा में एक सुंदर प्रतीकात्मक संदेश छिपा है—मनुष्य प्रकृति से प्राप्त करता है और अंततः उसी प्रकृति में लौटता है। इसलिए प्रकृति का संरक्षण केवल आवश्यकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है।
नई पीढ़ी के लिए संदेश
आधुनिकता और तकनीक के इस दौर में जीवन तेजी से बदल रहा है। नई पीढ़ी के पास शिक्षा और विकास के पहले से कहीं अधिक अवसर हैं, लेकिन इस परिवर्तन के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखना भी आवश्यक है।
करम पर्व नई पीढ़ी को यह सिखाता है कि परंपरा और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं हैं। आधुनिक ज्ञान और तकनीक को अपनाते हुए भी लोकभाषा, लोकगीत, लोकनृत्य और प्रकृति से जुड़े जीवन-मूल्यों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
इस दिशा में विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। लोकगीतों, लोककथाओं और पारंपरिक अनुष्ठानों का दस्तावेजीकरण तथा नई पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी इस विरासत को लंबे समय तक जीवित रख सकती है।
करम पर्व की आज की प्रासंगिकता
करम पर्व का संदेश आज केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विविधता की रक्षा की बात कर रही है, तब इस तरह की लोकपरंपराएं हमें प्रकृति और समुदाय के साथ संतुलित जीवन का मार्ग दिखाती हैं।
यह पर्व हमें सिखाता है कि विकास की दौड़ में प्रकृति को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता। परिवार और समाज से कटकर भी स्वस्थ जीवन संभव नहीं है। संस्कृति तभी जीवित रहती है जब उसे अगली पीढ़ी अपने जीवन में अपनाती है।
करम पर्व की यही विशेषता उसे एक साधारण धार्मिक आयोजन से कहीं व्यापक बना देती है। इसमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, कृषि-जीवन की आशा, भाई-बहन का स्नेह और सामाजिक एकता एक साथ दिखाई देते हैं।
करम की डाली के चारों ओर जब करम गीत गूंजते हैं, मांदर की थाप पर कदम थिरकते हैं और बहनें अपने भाइयों के मंगल की कामना करती हैं, तब केवल एक पर्व नहीं मनाया जाता—झारखंड की लोकआत्मा अपनी पूरी जीवंतता के साथ अभिव्यक्त होती है।
करम पर्व इसलिए केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मनुष्य के रिश्ते, परिवार के प्रति स्नेह, श्रम और कृषि के सम्मान तथा सामुदायिक जीवन की शक्ति का उत्सव है। यही इसकी सांस्कृतिक पहचान है और यही वह विरासत है जिसे आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाना हमारा दायित्व है।
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