Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

दिल , जिगर , हृदय , कलेजा

दिल , जिगर , हृदय , कलेजा

अरुण दिव्यांश
हृदय से लगा लो उस हृदय को ,
जो हृदय हृदय का बड़ा खास हो ।
हृदय रखे उस हृदय को संचित ,
जिस हृदय में हृदय का वास हो ।।
पहचान ले मानव का इंसानियत ,
हैवान तेरा कभी हो नहीं सकता ।
हैवानों को नहीं आते जाते देरी ,
इंसान कभी भी खो नहीं सकता ।।
हैवान तो अपनों का भी न होता ,
चाहे दे दे तू कलेजा निकालकर ।
चाहे बना लो जिगर का टुकड़ा ,
चाहे जितना रख लो संभालकर ।।
दिल तो लगता है उसी दिल से ,
जिस दिल से दिल का लगाव हो ।
हैवानों के तन दिल होता कहाॅं ,
ताकि दिल में कुछ उपजाव हो ।।
दिल तो होता दिलवाले के पास ,
चाहे उसके पास धन हो या न हो ।
मन भी तो होता बहुत ही चंचल ,
मन की भी सहमति हो या न हो ।।
मन का हृदय ये चिंता नहीं करता ,
मन भी न करता हृदय का मनन ।
हृदय यह होता निश्छल गंभीर ,
मन कर देता है हृदय का हनन ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ