"भोले शंकर सबसे न्यारे"
रचना – डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"शीश जटा में गंगा बहती,
चाँद सदा मुस्काता है।
नीलकंठ बन जग का विष पी,
सबका भार उठाता है।
दुख हरने को दौड़े आते,
उन-सा साथी और नहीं॥
तन पर भस्म, गले में नागिन,
हाथ त्रिशूल सुहाता है।
डमरू की पावन धुन सुनकर,
सारा जग झूम जाता है।
भोलेपन की ऐसी मूरत,
जग में कोई और नहीं॥
बेलपत्र की एक पत्ती से,
भोले रीझ ही जाते हैं।
सच्चे मन से जो भी पुकारे,
उसके घर तक आते हैं।
भाव-भक्ति के भूखे शंकर,
धन के लोभी और नहीं॥
गौरा संग कैलास विराजें,
नंदी सेवा करता है।
गणपति, कार्तिक संग बैठा,
सारा परिवार सँवरता है।
ऐसा सुंदर दिव्य परिवार,
जग में कोई और नहीं॥
भक्त पुकारे "बम-बम भोले",
दौड़े करुणा बरसाने।
टूटे मन में दीप जलाकर,
आए भाग्य जगाने।
दीन-दुखी का हाथ पकड़ लें,
ऐसा स्वामी और नहीं॥
भोले शंकर सबसे न्यारे,
दुनिया में कोई और नहीं।
"राकेश" को भी पार लगाना,कोई आप सा तारणहार नहीं॥
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