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प्रातः स्मरणीय है, भारतीय आजादी का इतिहास

प्रातः स्मरणीय है, भारतीय आजादी का इतिहास

कुमार महेंद्र
ध्येय था फिरंगी शासन से,
भारत को स्वतंत्र कराना।
अत्याचारों की ज्वाला में,
स्वाभिमान-दीप जलाना।
सर्वत्र शोषण, पीड़ा, क्रंदन,
चारों ओर मचा हाहाकार।
फिर भी हिंदुस्तान की धरती,
उगल रही थी रण-हुंकार।
‘फूट डालो और राज करो’ की,
कुटिल नीति के विरुद्ध प्रयास।
प्रातः स्मरणीय है, भारतीय आजादी का इतिहास।।


अतुल्य योगदान हर जन का,
स्वाधीनता के हित समर्पण।
किसी ने तन, किसी ने मन,
किसी ने धन किया अर्पण।
हँसते-हँसते कारा भोगी,
सहकर घोर यातनाओं का भार।
फाँसी के फंदे चूम गए,
हृदय लिए भारत का प्यार।
जेलों में भी गूँज रहा था,
स्वतंत्र प्रभात का उल्लास।
प्रातः स्मरणीय है, भारतीय आजादी का इतिहास।।


पसीने की हर एक बूँद ने,
रक्त-धारा का रूप लिया।
मातृभूमि की मुक्ति हेतु,
जीवन का सर्वस्व दिया।
अंतिम श्वास तलक रण-प्रण,
अडिग रहा हर वीर अजेय।
विपदा में भी धैर्य न टूटा,
दृढ़ संकल्प रहा अविजेय।
एकता के बल से जगा दी,
विजय-पर्व की प्रबल प्यास।
प्रातः स्मरणीय है, भारतीय आजादी का इतिहास।।


हिंसक-अहिंसक जन-आंदोलन,
दोनों बने स्वतंत्रता के स्वर।
सत्याग्रह की शक्ति प्रखर थी,
क्रांति जगा रही थी अंतर।
अनंत अनाम शहीदों ने,
भारत-माता पर प्राण लुटाए।
वीरों के पावन बलिदानों ने,
स्वतंत्रता के दीप जलाए।
त्याग-तपस्या की परिणति से,
खिला स्वतंत्रता का आकाश।
प्रातः स्मरणीय है, भारतीय आजादी का इतिहास।।


नमन उन ज्ञात-अज्ञात वीरों को,
जिनके त्याग से भारत मुक्त हुआ।
नमन उन वीर माताओं को,
जिनका लाल वतन पर न्योछावर हुआ।
नमन तिरंगे की शान को,
नमन अमर बलिदानी माटी।
जिनके त्याग से मिली हमें,
आजादी की अमर प्रभाती।
जब तक भारत-भूमि रहेगी,
गूँजेगा यह पावन विश्वास।
प्रातः स्मरणीय है, भारतीय आजादी का इतिहास।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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