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"अंतर का प्रकाश"

"अंतर का प्रकाश"

पंकज शर्मा
मित्रों जीवन में हर समय बाहरी परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं रहतीं। कभी संबंधों की ऊष्मा मंद पड़ती है, कभी सफलता के दीप बुझते हैं एवं कभी परिस्थितियों का अंधकार इतना गहरा हो जाता है कि आगे की दिशा दिखाई नहीं देती। ऐसे क्षणों में मनुष्य की वास्तविक शक्ति बाहरी प्रकाश में नहीं, उस अंतर्ज्योति में प्रकट होती है जिसे विपरीत परिस्थितियाँ भी बुझा नहीं पातीं। अपने भीतर विश्वास, विवेक एवं आशा की लौ जलाए रखना ही आत्मबल है।

अंधकार को कोसने से प्रकाश नहीं जन्मता; एक छोटी-सी अंतर्ज्योति ही पर्याप्त होती है। इसलिए परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठिन हों, अपने भीतर के सत्य से विमुख मत होना। समय बदलता है, लोग बदलते हैं, रास्ते बदलते हैं—पर जो मनुष्य अपने अंतर के प्रकाश को बचाए रखता है, वह अंधकार में भी अपनी दिशा‌ पहचान लेता है। वही प्रकाश अंततः जीवन को अर्थ देता है।

. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) 
 (कमल सनातनी)
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