राजधानी के नृत्य जगत में भाव, रस और अलंकार का आकर्षण दृष्टव्य नहीं
- नृत्य गुरुओं में उन्मुखीकरण के प्रति उदासीनता चिंताजनक
- स्वाध्याय, अध्ययन, अभ्यास और शोध से दूर होती जा रही शास्त्रीय नृत्य परंपरा
-हृदय नारायण झा
पटना। सांस्कृतिक संवाददाता के रूप में अब तक संवाद-संकलन और लेखन से प्राप्त अनुभवों को राज्य, विशेषकर राजधानी पटना की सांस्कृतिक चेतना के हित में साझा करना आवश्यक महसूस होता है। यदि संस्कृति के क्षेत्र में दिखाई दे रही कमियों और चुनौतियों पर संवाद नहीं होगा, तो सांस्कृतिक उन्मुखीकरण की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ सकेगी।
यह बात कहना आसान नहीं है, क्योंकि इससे राजधानी के नृत्य जगत से जुड़े अनेक नृत्यगुरुओं और कलाकारों की भावनाएं आहत हो सकती हैं। अनचाहे अस्वीकार—‘अनवांटेड रिजेक्शन’—जैसी मनोवैज्ञानिक बाधा भी कलाकारों को आत्ममंथन से रोकती है। लेकिन यदि सत्य का उद्घाटन पत्रकार का धर्म है, तो सांस्कृतिक पत्रकारिता का दायित्व भी यही है कि वह आवश्यक प्रश्नों को समाज और कला जगत के सामने रखे।
क्या भाव, रस और अलंकार की शिक्षा पर्याप्त रूप से दी जा रही है?
राजधानी के सक्रिय नृत्य साधकों, गुरुओं और कलाकारों से शास्त्रीय नृत्य की पात्रता, भाव, रस और अलंकार के प्रशिक्षण के संबंध में संवाद करने पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या हमारे नवांकुर और नवोदित कलाकारों को नृत्य-कौशल के साथ उसके भावात्मक और सौंदर्यशास्त्रीय पक्ष की भी पर्याप्त शिक्षा मिल रही है?
शास्त्रीय नृत्य केवल अंग संचालन, मुद्राओं और ताल-लय का प्रदर्शन नहीं है। उसके भीतर भाव, रस, अलंकार, अभिनय, साहित्य और संगीत का गहरा अंतर्संबंध है। नर्तक जब किसी काव्य, पद या कथा को मंच पर प्रस्तुत करता है तो उसके लिए केवल शारीरिक दक्षता पर्याप्त नहीं होती। उसे उस रचना के भाव और अर्थ को आत्मसात करना पड़ता है।
दुर्भाग्य यह है कि राजधानी के नृत्य प्रशिक्षण के क्षेत्र में इन मूलभूत तत्वों के प्रति अपेक्षित गंभीरता हर जगह दिखाई नहीं देती।
भाव के बिना रस की सृष्टि कैसे होगी?
नृत्य प्रदर्शन का मूल उद्देश्य केवल दर्शकों को आकर्षित करना नहीं, बल्कि उनके भीतर संवेग, प्रेम, करुणा, वीरता, हास्य, शांति अथवा अन्य भावों की अनुभूति उत्पन्न करना है।
जब कलाकार विषयवस्तु के अनुरूप भाव को स्वाभाविक रूप से व्यक्त नहीं कर पाता, तो प्रस्तुति तकनीकी रूप से सुंदर होने के बावजूद दर्शक के मन तक नहीं पहुंच पाती। भाव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति से ही रस की अनुभूति का मार्ग प्रशस्त होता है।
इसलिए प्रश्न यह है कि यदि प्रशिक्षण में भाव और रस की चेतना ही पर्याप्त रूप से विकसित नहीं होगी, तो मंच पर प्रस्तुत नृत्य दर्शकों के मन में स्थायी सांस्कृतिक प्रभाव कैसे उत्पन्न करेगा?
केवल प्रदर्शन नहीं, स्वाध्याय भी आवश्यक
आज राजधानी के नृत्य जगत के सामने दूसरी बड़ी चुनौती स्वाध्याय, अध्ययन, अभ्यास और शोध के प्रति उदासीनता की है।
नृत्यगुरु का दायित्व केवल विद्यार्थियों को कदम, मुद्रा और ताल सिखाना नहीं है। गुरु स्वयं जितना अध्ययन करेगा, उतना ही गहरा संस्कार अपने शिष्यों में विकसित कर सकेगा। शास्त्रीय नृत्य के साहित्यिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक आधार को समझे बिना उसकी प्रस्तुति को पूर्णता देना कठिन है।
नृत्य की परंपरा संस्कृत काव्य, साहित्य और भारतीय सौंदर्यशास्त्र से गहराई से जुड़ी रही है। इसलिए नृत्य में व्यक्त भाव काव्य के अर्थ और प्रसंग के अनुरूप होना चाहिए। इसके लिए संस्कृत, काव्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र और भारतीय कला-दर्शन का अध्ययन भी आवश्यक हो जाता है।
क्या गुरु स्वयं उन्मुख हैं?
यह प्रश्न कुछ कठोर अवश्य है, लेकिन विचारणीय है-क्या हम अपने नृत्य गुरुओं को निरंतर अध्ययन और उन्मुखीकरण के लिए पर्याप्त अवसर और प्रेरणा दे रहे हैं?
यदि गुरु स्वयं नवीन अध्ययन, शोध और परंपरा की गहराई से दूर रहेगा तो शिष्य तक वह चेतना कैसे पहुंचेगी?
आज आवश्यकता है कि राजधानी में नृत्यगुरुओं के लिए नियमित ओरिएंटेशन कार्यक्रम, कार्यशालाएं, शास्त्रीय नृत्य पर व्याख्यान, संस्कृत एवं काव्यशास्त्र अध्ययन सत्र तथा शोधपरक संवाद आयोजित किए जाएं। इससे कलाकारों को केवल मंचीय प्रदर्शन ही नहीं, बल्कि अपनी कला की जड़ों को समझने का अवसर मिलेगा।
विरासत को बचाने के साथ वर्तमान से जोड़ना होगा
राजधानी के संगीत और नृत्य जगत के सामने एक और महत्वपूर्ण चुनौती है—परंपरा को सुरक्षित रखते हुए उसे वर्तमान समय और समाज से जोड़ना।
गायन, नृत्य और अभिनय की हमारी विरासत अत्यंत समृद्ध रही है। लेकिन विरासत का अर्थ केवल पुरानी प्रस्तुतियों की पुनरावृत्ति नहीं है। विरासत तभी जीवित रहती है जब उसकी मूल आत्मा को सुरक्षित रखते हुए उसे वर्तमान पीढ़ी की संवेदना से जोड़ा जाए।
इसके लिए कलाकार को परंपरा का ज्ञाता होने के साथ-साथ वर्तमान समाज का सजग पर्यवेक्षक भी होना पड़ेगा।
पाटलिपुत्र की सांस्कृतिक विरासत हमें क्या संदेश देती है?
जिस पाटलिपुत्र की सांस्कृतिक परंपरा में कलाओं का अद्भुत वैभव रहा, जहां शालवती जैसी प्रसिद्ध नृत्यांगना और नगरवधू की कथाएं इतिहास का हिस्सा हैं, उसी पाटलिपुत्र की वर्तमान नृत्य परंपरा में यदि भाव, रस और अलंकार की चेतना कमजोर दिखाई दे रही है तो यह केवल कलाकारों का नहीं, बल्कि पूरी सांस्कृतिक व्यवस्था का प्रश्न है।
क्या यह हमारी सांस्कृतिक प्राथमिकताओं में आए परिवर्तन का संकेत है?
क्या मंचीय चमक ने कला के मूल साधना-पक्ष को पीछे छोड़ दिया है?
क्या हम नृत्य को केवल प्रस्तुति मान रहे हैं, साधना नहीं?
और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—यदि वर्तमान पीढ़ी को नृत्य की आत्मा से परिचित नहीं कराया गया तो आने वाले समय में पाटलिपुत्र की नृत्य-संगीत परंपरा का स्वरूप कैसा होगा?
अभी भी समय है आत्ममंथन का
यह आलेख किसी कलाकार अथवा नृत्यगुरु को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए है। राजधानी में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। आवश्यकता केवल इतनी है कि प्रतिभा को तकनीक के साथ दर्शन, प्रदर्शन के साथ अध्ययन और कौशल के साथ संस्कार भी मिले।
नृत्य तभी पूर्ण होगा जब शरीर के साथ मन बोलेगा, मन के साथ भाव व्यक्त होगा और भाव के साथ रस की अनुभूति उत्पन्न होगी।
पाटलिपुत्र की धरती ने सदियों से कला और संस्कृति को दिशा दी है। इसलिए आज आवश्यकता है कि राजधानी का नृत्य जगत अपने गौरवशाली अतीत से संवाद करे, वर्तमान की कमियों को स्वीकार करे और भविष्य के लिए ऐसी प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित करे जिसमें भाव, रस, अलंकार, साहित्य, साधना और शोध सभी का समान महत्व हो।अन्यथा मंच तो सजते रहेंगे, प्रस्तुतियां भी होती रहेंगी, लेकिन कला की वह आत्मा—जो दर्शक के हृदय को स्पर्श करती है-धीरे-धीरे हमसे दूर होती जाएगी।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews