सावन के झूले, प्रकृति के पाठ’
सत्येन्द्र कुमार पाठक
पात्र परिचय: - डुग्गू: थोड़ा चंचल, लेकिन नई बातें सीखने के लिए उत्सुक। पुच्चू: नटखट और खाने-पीने का शौकीन। पीहू: संवेदनशील और प्रकृति से प्यार करने वाली लड़की।।शशांक: गंभीर, जिज्ञासु और सवाल पूछने वाला। अंशिका: होशियार और सभी को साथ लेकर चलने वाली। दादा जी: अनुभव और संस्कारों से भरे, बच्चों के प्रिय मार्गदर्शक। माता जी: ममतामयी, स्वादिष्ट पकवान बनाने वाली और देखभाल करने वाली। पिता जी: पर्यावरण-प्रेमी और बच्चों को सही राह दिखाने वाले।
स्थान: - दादा जी का विशाल पारंपरिक दालान (बरामदा)। सामने एक हरा-भरा बगीचा है जिसमें आम, महुआ और अमरूद के घने पेड़ हैं। रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ हैं और आम के एक बड़े पेड़ की मजबूत डाली पर रस्सी और लकड़ी से बना एक पारंपरिक झूला बंधा है।
(मंच पर हल्की रिमझिम बारिश की आवाज़ और बादलों की हल्की गड़गड़ाहट। पृष्ठभूमि में हरियाली का सुंदर दृश्य है। बच्चे झूले के आसपास खेल रहे हैं और बारी-बारी से झूला झूल रहे हैं।)
पीहू: (झूले पर बैठते हुए) डुग्गू, थोड़ा तेज़ धक्का दो! देखो, हवा कितनी ठंडी और सुहानी है!
डुग्गू: (पींग बढ़ाते हुए) यह लो पीहू! छू लो आसमान!
पुच्चू: (अपने पेट पर हाथ फेरते हुए) अरे भाई, आसमान को बाद में छूना, ज़रा यह बताओ कि इस रिमझिम बारिश में दालान से पकौड़ों की खुशबू कब आएगी?
अंशिका: (हँसते हुए) पुच्चू! तुम्हारा ध्यान हमेशा खाने पर ही रहता है। ज़रा देखो तो सही, बारिश की बूँदों से अमरूद और आम के पत्ते कैसे चमक रहे हैं!
शशांक: बिल्कुल! और वो देखो, महुआ के पेड़ के नीचे छोटे-छोटे फूल गिर रहे हैं। सावन आते ही पूरी प्रकृति कितनी सुंदर और नई-नई सी लगने लगती है।
(तभी माता जी हाथ में गरम-गरम पकौड़ों की प्लेट और पिता जी पानी के कुल्हड़ लेकर दालान में आते हैं।)
माता जी: लो भई बच्चों! सावन की रिमझिम बारिश हो और गरम पकौड़े न हों, ऐसा तो हो ही नहीं सकता!
पुच्चू: (दौड़कर पास जाते हुए) वाह मम्मी जी! आपने तो मेरे मन की बात सुन ली!
पिता जी: आराम से पुच्चू! पहले हाथ धो लो। और हाँ, सब मिलकर खाओ।
डुग्गू: पापा, सावन का यह महीना इतना खास क्यों होता है? सब इतने खुश क्यों दिखते हैं।
(दालान में दादा जी अपनी छड़ी टेकते हुए आते हैं। सफेद कुर्ता-पायजामा और चेहरे पर स्नेह भरी मुस्कान। बच्चे दौड़कर दादा जी के पास जाते हैं और उन्हें आराम से कुर्सी पर बैठाते हैं।)
दादा जी: (बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए) वाह! आज तो पूरा बाल-मंडल जमा है। डुग्गू बेटा, तुमने बहुत अच्छा सवाल पूछा। सावन सिर्फ बारिश का मौसम नहीं है, यह प्रकृति का उत्सव है।
अंशिका: दादा जी, इस उत्सव से हमें क्या सीखने को मिलता है?
दादा जी: (बगीचे की तरफ इशारा करते हुए) बच्चों, जरा ध्यान से देखो इस महुआ, आम और अमरूद के पेड़ों को। सावन की रिमझिम बूँदें इन पर बरस रही हैं।
बूँदों से सीख: बारिश की बूँदें कभी यह नहीं सोचतीं कि वे किस पर गिर रही हैं। वे अमीर-गरीब, इंसान-जानवर सबको एक समान ठंडक देती हैं। यह हमें ‘परमार्थ’ (दूसरों की सेवा) सिखाती हैं।
पेड़ों से सीख: ये पेड़ खुद कड़ी धूप और तूफ़ान सहते हैं, लेकिन हमें मीठे फल और शीतल छाया देते हैं। यह हमें ‘सहनशीलता और उदारता’ सिखाते हैं।
शशांक: और दादा जी, यह जो झूला हम झूल रहे हैं, यह हमें क्या सिखाता है?
पिता जी: (मुस्कुराते हुए) शशांक, जब तुम झूले पर पींग बढ़ाते हो, तो झूला पीछे जाता है ना?
शशांक: हाँ पापा!
पिता जी: पीछे जाने से क्या तुम डर जाते हो? नहीं ना! क्योंकि तुम्हें पता है कि झूला जितनी ज़ोर से पीछे जाएगा, उतनी ही ऊँचाई तक आगे भी आएगा। जीवन भी इस झूले जैसा ही है। जब दुख या कठिनाई (पीछे जाना) आए, तो घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि उसके बाद सफलता और खुशी (आगे जाना) निश्चित है।
पीहू: (उत्साहित होकर) वाह दादा जी! वाह पापा! सावन का झूला तो हमें जीवन का संतुलन सिखाता ह
पुच्चू: (पकौड़ा चबाते हुए) दादा जी, बारिश की बूँदें, पेड़ और झूला सब इतने अच्छे हैं, तो फिर लोग पेड़ों को क्यों काटते हैं?
माता जी: यही तो चिंता की बात है पुच्चू। जब लोग लालच में आकर पेड़ काटते हैं, तो बारिश कम होती है और सावन की यह सुंदरता खोने लगती है।
डुग्गू: (उदास होकर) तो क्या एक दिन यह सब खत्म हो जाएगा?
दादा जी: नहीं बेटा! अगर तुम जैसे बच्चे ठान लें, तो हम अपनी धरती को फिर से हरा-भरा बना सकते हैं।
अंशिका: दादा जी, आज सावन के इस पावन दिन पर हम सब एक संकल्प लेते हैं!
शशांक: कैसा संकल्प अंशिका?
अंशिका: हम सिर्फ झूला झूलकर सावन का आनंद ही नहीं लेंगे, बल्कि इस सावन में हम सब मिलकर इस बगीचे में नए पौधे भी लगाएंगे!
सब बच्चे मिलकर: (एक सुर में) हाँ! हम सब पौधे लगाएंगे!
पीहू: मैं अमरूद का नया पौधा लगाऊँगी!
डुग्गू: मैं आम की गुठली से नया पेड़ उगाऊँगा!
पिता जी: (खुश होकर) बहुत बढ़िया! मैं तुम सबके लिए पौधों की पौध (Saplings) और खाद लेकर आता हूँ।
माता जी: और मैं तुम सबको पौधे लगाने के बाद मीठी खीर खिलाऊँगी!
(सब बच्चे खुशी से ताली बजाते हैं। पिता जी खुरपी और पौधे लाते हैं। बच्चे बगीचे के एक कोने में जाकर ध्यान से पौधा लगाते हैं और उसमें पानी डालते हैं। फिर सब हाथ पकड़कर झूले के पास आते हैं।)
(हल्की बारिश का संगीत फिर से बजने लगता है। सब बच्चे मिलकर झूले के चारों ओर गाते और नाचते हैं।)
सब बच्चे मिलकर:
"रिमझिम-रिमझिम बूँदें आई,
सावन संग हरियाली लाई!
पेड़ लगाएँ, धरा बचाएँ,
ज्ञान का दीप सब जग में जलाएँ!"
दादा जी: (आगे आकर दर्शकों से)
"सावन का यह झूला हमें सिखाता है आगे बढ़ना,
और ये पेड़ सिखाते हैं निस्वार्थ भाव से जीना!
आओ इस सावन केवल खुशियाँ ही न मनाएँ,
एक-एक पौधा लगाकर, अपनी धरती को स्वर्ग बनाएँ!"
(सब पात्र मुस्कुराते हुए दर्शकों को प्रणाम करते हैं। पृष्ठभूमियों में तालियों की गूँज और बारिश का सुहाना संगीत।)[पर्दा गिरता है]
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews