तिरंगे की मर्यादा, किसान-मजदूर और अहिंसा के सवालों के बीच ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की प्रासंगिकता पर उठे सवाल

- “जब तिरंगे की मूल भावना किसान, मजदूर और अहिंसा से जुड़ी है, तो वर्तमान परिस्थितियों में इसकी रक्षा कौन करेगा?” - हृदय नारायण झा
पटना। राजधानी पटना में आज कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से गांधी मैदान स्थित जे.पी. गोलंबर से कारगिल चौक तक तिरंगा यात्रा का आयोजन किया गया। यात्रा में सरकार से जुड़े भाजपा के मंत्री, विधायक, प्रदेश स्तर के कार्यकर्ता, विभिन्न सरकारी संस्थानों के बच्चे एवं युवा, पुलिसकर्मी, एनसीसी कैडेट सहित बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। तिरंगा यात्रा के माध्यम से राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रीय एकता और जनभागीदारी का संदेश देने का प्रयास किया गया।
हालांकि, इसी तिरंगा यात्रा की पृष्ठभूमि में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की प्रासंगिकता, तिरंगे की मूल भावना और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर वरिष्ठ चिंतक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता हृदय नारायण झा ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
हृदय नारायण झा ने कहा कि तिरंगा केवल एक राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता चेतना, त्याग, समन्वय, सामाजिक न्याय, प्रकृति-प्रेम और अहिंसा की भावना का प्रतीक है। ऐसे में केवल सरकारी स्तर पर तिरंगा यात्रा निकाल देना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि देश और समाज के सामने यह स्पष्ट किया जाए कि तिरंगे की मर्यादा और उसके मूल मूल्यों की रक्षा के लिए शासन, राजनीतिक नेतृत्व और आम नागरिक क्या कर रहे हैं।.jpeg)
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आधा किलोमीटर से भी कम दूरी की यात्रा से क्या मिलेगा संदेश?
झा ने सवाल उठाया कि यदि वर्तमान केंद्रीय एवं राज्य शासन व्यवस्था तिरंगे की मूल भावना और उसकी मर्यादा की रक्षा करने की स्थिति में नहीं है, तो ‘हर घर तिरंगा’ अभियान और तिरंगा यात्राओं का वास्तविक औचित्य क्या है?
उन्होंने कहा कि गांधी मैदान से कारगिल चौक तक आयोजित तिरंगा यात्रा राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय एकता का संदेश देने का माध्यम हो सकती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या राष्ट्रप्रेम केवल सरकारी कार्यक्रमों, यात्राओं और समारोहों तक सीमित रह गया है?
उनके अनुसार, जब समाज में विचारों का दायरा संकुचित होता जा रहा हो, वाणी अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार इस्तेमाल की जा रही हो तथा सत्ता और राजनीतिक दलों की गतिविधियां व्यापक सामाजिक सरोकारों के बजाय सीमित राजनीतिक हितों के इर्द-गिर्द केंद्रित होती जा रही हों, तब तिरंगे के वास्तविक संदेश को समझना और भी आवश्यक हो जाता है।
उन्होंने कहा कि आज समन्वय की दृष्टि कमजोर पड़ रही है और राजनीतिक मूल्य हाशिए पर दिखाई दे रहे हैं। विविधता में एकता भारत की सबसे बड़ी पहचान रही है, लेकिन धर्म, जाति, ऊंच-नीच और सामाजिक विभाजन की प्रवृत्तियों ने इस भावना के सामने चुनौती खड़ी कर दी है।
“राष्ट्रीय एकता सत्ता और शासन की भागीदारी तक सीमित नहीं हो सकती”
हृदय नारायण झा ने कहा कि गणतंत्र का आदर्श केवल सत्ता में बैठे लोगों की भागीदारी से पूरा नहीं होता। राष्ट्रीय एकता का अर्थ समाज के प्रत्येक वर्ग की सम्मानजनक भागीदारी है।
उन्होंने कहा कि यदि आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर असंतोष बढ़ रहा है और समाज में जनआक्रोश की स्थिति बन रही है, तो केवल राष्ट्रवाद के प्रतीकों का प्रदर्शन पर्याप्त नहीं होगा। राष्ट्रवाद की वास्तविक कसौटी नागरिकों के अधिकारों, सम्मान, अवसर और न्याय की रक्षा है।
झा ने आरोप लगाया कि सत्ता के स्वार्थ में राष्ट्रीय सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, गुण, धर्म, शिक्षा और संस्कार के गौरव को नकारने अथवा दरकिनार करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ऐसी परिस्थितियों में सरकारी तंत्र के माध्यम से तिरंगा यात्रा निकालकर उसे राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रीय एकता और जनभागीदारी का प्रतीक बताने से पहले यह आत्ममंथन जरूरी है कि शासन की नीतियों और व्यवहार में इन मूल्यों का कितना पालन हो रहा है।
तिरंगा केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, विचार और जीवन-मूल्यों का प्रतीक
हृदय नारायण झा ने कहा कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति में राष्ट्रप्रेम को केवल नारों और प्रतीकों से नहीं जोड़ा गया है। इसके लिए सामाजिक शील, पारिवारिक चरित्र और व्यक्तिधर्म के पालन को आवश्यक माना गया है।
उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानियों का उदाहरण देते हुए कहा कि आजादी की लड़ाई लड़ने वाले लोग केवल राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे। वे शरीर से स्वस्थ और मजबूत, विचारों से प्रभावशाली, लेखनी के धनी, पत्रकार, कवि, क्रांतिकारी, शास्त्रों के ज्ञाता, प्रखर वक्ता और आत्मत्यागी भी थे।
उनके जीवन में तिरंगे के तीनों रंगों की प्रतीकात्मक भावना दिखाई देती थी—केसरिया त्याग और साहस का, सफेद सादगी एवं सत्य का तथा हरा प्रकृति और जीवन के प्रति प्रेम का प्रतीक।
उन्होंने कहा कि यदि आज तिरंगा हर घर तक पहुंचाने का अभियान चलाया जा रहा है तो इसके साथ उसके पीछे के विचार और इतिहास को भी घर-घर पहुंचाने की आवश्यकता है।
पिंगली वेंकैया और तिरंगे की परिकल्पना का संदर्भ
झा ने तिरंगे के निर्माण के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की यात्रा स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक वैचारिक चेतना से जुड़ी रही है। उन्होंने महात्मा गांधी और स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय ध्वज की परिकल्पना के पीछे भारत के विभिन्न वर्गों और समुदायों को जोड़ने की भावना थी।
उन्होंने कहा कि तिरंगे की प्रारंभिक परिकल्पना में चरखे का भी महत्वपूर्ण स्थान था, जो स्वावलंबन, श्रम और आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। बाद में राष्ट्रीय ध्वज में चरखे के स्थान पर अशोक चक्र को स्थान दिया गया।
झा का कहना है कि तिरंगे की यात्रा को केवल रंगों और डिजाइन तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे किसान, श्रमिक, स्वावलंबन, सत्य, त्याग, शांति और राष्ट्रीय एकता जैसी व्यापक अवधारणाएं जुड़ी हुई हैं।
“आज किसान परेशान है, मजदूर तनाव में है और अहिंसा संकट में”
हृदय नारायण झा ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस तिरंगे की मूल भावना में किसान और मजदूर की चिंता तथा अहिंसा का संदेश निहित था, आज उन्हीं वर्गों की स्थिति पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि किसान अनेक प्रकार की आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जबकि मजदूर वर्ग भी रोजगार, आय और जीवन की असुरक्षा जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। दूसरी ओर समाज में कायिक, वाचिक और मानसिक हिंसा के विभिन्न रूप बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
उन्होंने सवाल किया कि जब सामाजिक जीवन में हिंसा, वैमनस्य और विभाजन की प्रवृत्तियां बढ़ रही हों, तब तिरंगे के माध्यम से अहिंसा, शांति और सामाजिक समरसता का संदेश किस प्रकार मजबूत किया जाएगा?
“चुनावी राजनीति के हवनकुंड में तिरंगे की समावेशी भावना न जले”
झा ने कहा कि भारत का तिरंगा किसी एक जाति, धर्म, भाषा अथवा राजनीतिक दल का प्रतीक नहीं है। यह पूरे भारत की सामूहिक पहचान है।
उनका कहना है कि चुनावी राजनीति में जब जाति और धर्म के आधार पर समाज को विभाजित करने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो तिरंगे की वह भावना कमजोर होती है जो सभी भारतीयों को एक सूत्र में जोड़ती है।
उन्होंने कहा कि तिरंगे की वास्तविक प्रतिष्ठा तभी होगी जब जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और सामाजिक स्थिति से ऊपर उठकर नागरिकों में भारतीयता की भावना मजबूत होगी।
ध्वज निर्माण से जुड़े नेताओं की सोच को याद करने की जरूरत
हृदय नारायण झा ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक विमर्श से जुड़ी थी। महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. बी.आर. आंबेडकर, सी. राजगोपालाचारी, के.एम. मुंशी सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका और उस दौर की वैचारिक बहस को आज की पीढ़ी के सामने रखना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि इन नेताओं के लिए राष्ट्र केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं था, बल्कि एक जीवंत सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक अवधारणा था।
ऐसे में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने घरों पर झंडा लगाया गया, बल्कि इससे भी मापी जानी चाहिए कि कितने घरों में राष्ट्रप्रेम, संवैधानिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता, अहिंसा, सत्य, त्याग और नागरिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत हुई।
“हर घर तिरंगा” अभियान पर पांच बड़े सवाल
हृदय नारायण झा ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के संदर्भ में कई सवाल उठाते हुए कहा कि देशहित में इनका उत्तर मिलना चाहिए-
- क्या तिरंगा केवल सरकारी कार्यक्रमों और अभियानों तक सीमित रह गया है?
- तिरंगे में निहित किसान, मजदूर और अहिंसा की भावना को मजबूत करने के लिए क्या ठोस प्रयास हो रहे हैं?
- क्या राजनीतिक दल अपने आचरण और नीतियों में राष्ट्रीय एकता तथा सामाजिक समरसता को प्राथमिकता दे रहे हैं?
- क्या नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और सम्मान की रक्षा को राष्ट्रप्रेम का अनिवार्य हिस्सा माना जा रहा है?
‘हर घर तिरंगा’ अभियान का वास्तविक उद्देश्य जनभागीदारी और राष्ट्रचेतना है या यह केवल राजनीतिक प्रदर्शन तक सीमित होकर रह गया है?
“तिरंगा घर तक पहुंचे, लेकिन उसके मूल्य भी पहुंचें”
झा ने कहा कि वह तिरंगा अभियान के विरोध में नहीं हैं, बल्कि चाहते हैं कि इस अभियान को और अधिक सार्थक, व्यापक और मूल्यपरक बनाया जाए।
उन्होंने कहा कि हर घर पर तिरंगा लहराना तभी सार्थक होगा जब हर घर में तिरंगे के मूल्यों की भी चर्चा हो। बच्चों को यह बताया जाए कि तिरंगा किन संघर्षों, त्यागों और विचारों की देन है। उन्हें यह समझाया जाए कि राष्ट्रप्रेम केवल झंडा फहराने, यात्रा निकालने अथवा नारे लगाने का नाम नहीं है।
राष्ट्रप्रेम का अर्थ है-किसान का सम्मान, मजदूर की सुरक्षा, महिला का सम्मान, बच्चों की शिक्षा, प्रकृति की रक्षा, सामाजिक समरसता, नागरिक अधिकारों की सुरक्षा, सत्य और अहिंसा का पालन तथा देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन।
“जवाब नेतृत्व को देना होगा”
हृदय नारायण झा ने अंततः सवाल उठाते हुए कहा कि जब तिरंगे की मूल भावना से जुड़े किसान और मजदूर कठिनाइयों से जूझ रहे हों, जब समाज में विभिन्न प्रकार की हिंसा और विभाजन की प्रवृत्तियां मौजूद हों और जब राष्ट्रीय एकता को राजनीतिक हितों से ऊपर उठाने की आवश्यकता हो, तब ‘हर घर तिरंगा’ अभियान का औचित्य क्या है और इसका वास्तविक लाभ किसे मिलेगा?
उन्होंने कहा कि अभियान के परिकल्पकों और राजनीतिक नेतृत्व को देश के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह अभियान किस प्रकार राष्ट्रहित, सामाजिक समरसता, संवैधानिक मूल्यों और जनभागीदारी को मजबूत करेगा।
उन्होंने सवाल किया कि क्या यह अभियान वास्तव में तिरंगे की मर्यादा और उसके मूल आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास है या फिर केवल राजनीतिक दलों के राष्ट्रप्रेम के प्रदर्शन का माध्यम बनकर रह जाएगा?झा ने कहा कि तिरंगा किसी दल का नहीं, पूरे राष्ट्र का है। इसलिए तिरंगे की मर्यादा की रक्षा की जिम्मेदारी भी सत्ता और विपक्ष दोनों से ऊपर उठकर प्रत्येक भारतीय की है।
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