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है कौन जो बिगड़ी हुई तकदीर सँवारे

है कौन जो बिगड़ी हुई तकदीर सँवारे

  • भारतीय नृत्य कला मंदिर की फिजाओं में पिंजरे के पंछी जैसा हाल-ए-हाल
- हृदय नारायण झा

पटना। पद्मश्री हरि उप्पल द्वारा स्थापित भारतीय नृत्य कला मंदिर आज अपनी पहचान और मूल स्वरूप को लेकर जिस दौर से गुजर रहा है, उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो यह संस्था अपने ही विभागीय व्यवस्था-तंत्र से आर्त स्वर में पुकार रही हो-
“आ जा ओ... आ जा... मेरे बरबाद मुहब्बत के सहारे, वो कौन है जो बिगड़ी हुई तकदीर सँवारे?”

कभी शास्त्रीय नृत्य एवं संगीत शिक्षा-प्रशिक्षण की महत्वपूर्ण पहचान रहे भारतीय नृत्य कला मंदिर के स्वरूप में लगातार परिवर्तन दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि यह परिवर्तन संस्था के मूल उद्देश्य को मजबूत करने के लिए है या धीरे-धीरे उसकी मौलिक पहचान को समाप्त करने की दिशा में बढ़ रहा है?

स्वरूप भंग हुआ, व्यवस्था भंग हुई और अब क्या अस्तित्व भंग करने की तैयारी है? यह सवाल आज कला प्रेमियों, कलाकारों और संस्कृति से जुड़े लोगों के बीच चर्चा का विषय बनना चाहिए।
हरि उप्पल की परिकल्पना से कितनी दूर पहुंचा कला मंदिर?

भारतीय नृत्य कला मंदिर की स्थापना जिस उद्देश्य और दृष्टि से हुई थी, उसमें नृत्य शिक्षा को केवल मंचीय प्रदर्शन तक सीमित नहीं माना गया था। कला साधना, अनुशासन, प्रशिक्षण और गुरु-शिष्य परंपरा इसके मूल आधार थे।

लेकिन वर्तमान स्थिति में हरि उप्पल द्वारा संचालित मूल नृत्य शिक्षा-प्रशिक्षण पाठ्यक्रम दिखाई नहीं देता। वर्तमान में यहां के प्रशिक्षु प्रयाग संगीत समिति के पाठ्यक्रम के माध्यम से प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।

यह परिवर्तन अपने आप में एक बड़ा सांस्कृतिक प्रश्न है।

यदि किसी संस्था की स्थापना जिस विशिष्ट उद्देश्य और पाठ्यक्रम के साथ हुई थी, वही पाठ्यक्रम धीरे-धीरे समाप्त हो जाए और उसकी जगह किसी अन्य संस्था का पाठ्यक्रम ले ले, तो क्या संस्था की मूल पहचान सुरक्षित रह सकती है?
नाम भारतीय नृत्य कला मंदिर, व्यवस्था हिन्दुस्तानी संगीत प्रशिक्षण केन्द्र जैसी!

एक और गंभीर प्रश्न संस्था के वर्तमान स्वरूप को लेकर उठता है।

आरोप है कि भारतीय नृत्य कला मंदिर को बिना नाम बदले उसकी मूल संरचना से अलग करते हुए हिन्दुस्तानी संगीत प्रशिक्षण केन्द्र के अनुरूप संचालित किया जा रहा है। संविदा शिक्षकों की नियुक्ति के माध्यम से कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा विभिन्न विधाओं का प्रशिक्षण संचालित किया जा रहा है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि संस्था का नाम भारतीय नृत्य कला मंदिर है तो उसकी गतिविधियों और प्रशिक्षण की केंद्रीय पहचान क्या होनी चाहिए?

आज स्थिति यह बताई जाती है कि संस्था में शास्त्रीय गायन, उपशास्त्रीय गायन, लोकगीत, लोकनृत्य के साथ-साथ तबला, गिटार, सितार, कैसियो, बांसुरी आदि वाद्ययंत्रों का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

इन तमाम विधाओं के बीच मूल नृत्य प्रशिक्षण का दायरा कथित रूप से छह से घटकर तीन शास्त्रीय नृत्य विधाओं—भरतनाट्यम, ओडिसी और कथक—तक सीमित रह गया है। वह भी अपेक्षित संसाधनों और व्यवस्थागत सुविधाओं के अभाव में संचालित होने की बात सामने आती है।

यह स्थिति संस्था की मूल अवधारणा और वर्तमान कार्यप्रणाली के बीच एक बड़ा अंतर पैदा करती है।
गुरु और कलाकारों की स्थिति पर भी सवाल

कला शिक्षा की गुणवत्ता केवल पाठ्यक्रम से निर्धारित नहीं होती। इसके लिए प्रशिक्षित गुरु, पर्याप्त समय, उचित पारिश्रमिक, बेहतर आवासीय सुविधा और ऐसा वातावरण आवश्यक होता है जिसमें कलाकार अपनी पूरी क्षमता के साथ साधना कर सके।

वर्तमान में व्याख्याताओं को लगभग 28-29 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलने की बात कही जा रही है।

इसके विपरीत, हरि उप्पल के समय भारतीय नृत्य कला मंदिर के व्याख्याताओं के लिए परिसर में ही आवासीय सुविधा उपलब्ध थी। इसका उद्देश्य केवल सुविधा देना नहीं था, बल्कि कला प्रशिक्षण की गुणवत्ता को बेहतर बनाना भी था।

परिसर में रहने वाले व्याख्याताओं की सेवा प्रशिक्षुओं और संस्था को अधिक पूर्णकालिक रूप में उपलब्ध रहती थी। गुरु और शिष्य के बीच निरंतर संवाद तथा कला-साधना का वातावरण भी इससे बनता था।
आवासीय सुविधा खत्म होने से क्या बदला?

बताया जाता है कि बाद में परिसर की आवासीय व्यवस्था समाप्त कर दी गई। पुराने आवासीय परिसर को हटा दिया गया, लेकिन उसके स्थान पर अब तक वैसी आवासीय व्यवस्था का पुनर्निर्माण नहीं हुआ।

नतीजा यह है कि शिक्षक और कला साधक किराये के मकानों में रहकर उसी मानदेय पर सेवा करने के लिए बाध्य हैं।

यदि कोई कलाकार या शिक्षक वर्षों तक अस्थायी अथवा किराये के आवास में रहते हुए सीमित मानदेय में सेवा करता है, तो उसके मनोभाव पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

क्या ऐसी परिस्थितियां कलाकार को अपनी सम्पूर्ण रचनात्मक क्षमता लगाने के लिए प्रेरित करेंगी?

क्या वह संगीत और नृत्य जैसी सरस, समरस और साधनापरक विद्या को पूरी ऊर्जा और समर्पण के साथ अगली पीढ़ी तक पहुंचा पाएगा?

यह प्रश्न केवल शिक्षक का नहीं, बल्कि पूरी कला शिक्षा व्यवस्था का है।
तीन साल से इंतजार—कब लौटेगा कला मंदिर का अपना घर?

यदि आवासीय परिसर को हटाए जाने के बाद तीन वर्ष बीत चुके हैं और उसका पुनर्निर्माण नहीं हुआ है, तो विभाग को कलाकारों और संस्कृति प्रेमियों के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि इसके पुनर्निर्माण की योजना क्या है।

कला संस्थान केवल भवन से नहीं बनता, लेकिन उचित भवन, संसाधन और वातावरण कला साधना के लिए आधारभूत आवश्यकता अवश्य हैं।

यदि गुरु को रहने की सुविधा नहीं, प्रशिक्षुओं को पर्याप्त संसाधन नहीं और संस्था को उसका मूल पाठ्यक्रम नहीं, तो फिर केवल नाम बच जाने से संस्था की आत्मा कैसे बचेगी?
पिंजरे के पंछी जैसा क्यों महसूस कर रहा है कला जगत?

भारतीय नृत्य कला मंदिर कभी कलाकारों के लिए खुले आकाश की तरह रहा होगा—जहां नृत्य, संगीत, साधना और सृजन को विस्तार मिलता था।

आज यदि कलाकार स्वयं को विभागीय व्यवस्था के बीच सीमित महसूस कर रहे हैं, तो यह चिंता का विषय है।

कला को आदेश से नहीं, वातावरण से विकसित किया जाता है।
साधना को फाइलों से नहीं, समर्पण से गति मिलती है।
और कलाकार को केवल मानदेय से नहीं, सम्मान और उचित व्यवस्था से प्रेरणा मिलती है।

इसीलिए भारतीय नृत्य कला मंदिर की वर्तमान स्थिति पर गंभीर सांस्कृतिक विमर्श की आवश्यकता है।
सरकार और कला एवं संस्कृति विभाग से कुछ सीधे सवाल

कला एवं संस्कृति विभाग को स्पष्ट करना चाहिए—

भारतीय नृत्य कला मंदिर का वर्तमान मूल उद्देश्य और प्रशिक्षण दर्शन क्या है?


हरि उप्पल द्वारा विकसित मूल नृत्य शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रम का वर्तमान स्वरूप क्या है?


संस्था में दूसरे संस्थान के पाठ्यक्रम को लागू करने का निर्णय क्यों लिया गया?


क्या भारतीय नृत्य कला मंदिर को हिन्दुस्तानी संगीत प्रशिक्षण केन्द्र के अनुरूप परिवर्तित किया जा रहा है?


परिसर की आवासीय सुविधा क्यों समाप्त की गई?


तीन वर्षों से आवासीय परिसर के पुनर्निर्माण की दिशा में क्या कार्रवाई हुई?


संविदा व्याख्याताओं के मानदेय और सेवा शर्तों में सुधार की कोई योजना है?


संस्था के मूल नृत्य प्रशिक्षण को पुनः मजबूत करने के लिए सरकार की दीर्घकालिक योजना क्या है?
नाम नहीं, पहचान बचाने की जरूरत

भारतीय नृत्य कला मंदिर के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न उसके नाम को बचाने का नहीं, उसकी पहचान को बचाने का है।

केवल भवन पर “भारतीय नृत्य कला मंदिर” लिख देने से हरि उप्पल की परिकल्पना जीवित नहीं होगी। उसके लिए वही साधना, वही प्रशिक्षण की गंभीरता, वही गुरु-शिष्य संबंध, वही शोधपरक दृष्टि और वही सांस्कृतिक वातावरण चाहिए।

आज कला एवं संस्कृति विभाग के सामने चुनौती है कि वह इस संस्था को केवल प्रशासनिक नियंत्रण में चलने वाला एक प्रशिक्षण केन्द्र बनाए रखता है या इसे फिर से बिहार की शास्त्रीय कला साधना का महत्वपूर्ण केन्द्र बनाता है।

कहीं ऐसा न हो कि भारतीय नृत्य कला मंदिर का नाम तो इतिहास में बचा रहे, लेकिन उसकी आत्मा इतिहास का हिस्सा बन जाए।

और तब सचमुच पाटलिपुत्र की सांस्कृतिक फिजाओं में यही सवाल गूंजेगा—
“है कौन जो बिगड़ी हुई तकदीर सँवारे?”

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