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'शिव : मौन का अंतिम स्पर्श"

'शिव : मौन का अंतिम स्पर्श"

पंकज शर्मा
जब काल भी
शिशु-सा सोया था,
न दीप था,
न तम—
केवल मौन था।

उस मौन में
जो स्वयं में जागा,
वही शिव था।

शून्य रिक्त नहीं-
अनंत का गर्भ है।

अनंत दूर नहीं-
चेतना का आकाश है।

जहाँ दोनों
एक हो जाते हैं,
वहीं शिव
स्पंदित होते हैं।

जटाओं की गंगा
जल नहीं-
करुणा है।

तीसरा नेत्र
ज्वाला नहीं-
सत्य का प्रकाश है।

शिव असत्य
का संहार नहीं करते,
उसका आवरण
हटा देते हैं।

कंठ में विष,
और भीतर
करुणा का नील आकाश।
नीलकंठ होना-
विष को सहना,
पर उसे
स्वभाव न बनने देना।

जब 'मैं'
अपनी प्रतिध्वनि से
थक जाता है,
तब मौन उतरता है।
न साधक,
न साधना-
केवल साक्षी।

निर्मोही,
निष्कंप,
निरभिमान।

वही शिव है।

जब मंत्र
मौन हो जाएँ,
विचार
अपने स्रोत में लौटें,
और प्रार्थना
शब्दों से मुक्त हो जाए-

तब न शून्य रहता है,
न प्रकाश,
न अंधकार।

केवल चेतना-
अपने भीतर
स्वयं को पहचानती हुई।


ऋषियों ने
उसे शिव कहा,
योगियों ने समाधि,
वेदों ने ब्रह्म।


पर जहाँ
नाम भी समाप्त हो जाते हैं-
वहीं से
शिव आरंभ होते हैं।


स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित

✍️"कमल की कलम से"✍️

(शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
 
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