धाता और विधाता की रोचक कथा

लेखक: आनन्द हठीला
जब ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि भृगु का विवाह प्रजापति दक्ष की कन्या ख्याति से हुआ, तो उनके गर्भ से तीन संतानों ने जन्म लिया। दो पुत्र हुए जिनका नाम धाता और विधाता रखा गया, और एक अत्यंत रूपवती कन्या हुईं जो स्वयं साक्षात लक्ष्मी जी थीं (इन्हें भृगु की पुत्री होने के कारण 'भार्गवी लक्ष्मी' कहा जाता है, जिनका विवाह भगवान विष्णु से हुआ)।
धाता का अर्थ: धारण करने वाला। विधाता का अर्थ: व्यवस्था करने वाला या विधान बनाने वाला।
ये दोनों भाई सदा एक साथ रहते हैं और इन्हें ब्रह्मा जी की इच्छा के अनुसार सृष्टि के नियमन का कार्य सौंपा गया था।
धाता और विधाता का मुख्य कार्य मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखना और ब्रह्मांड में संतुलन बनाए रखना है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विधाता मनुष्यों के भाग्य, आयु और प्रारब्ध का निर्धारण करते हैं। विधाता को लोक-भाषा में कई बार 'विधाता माता' या 'भाग्य विधाता' के रूप में भी याद किया जाता है, जो जीवों के कर्मों के अनुसार उनके जीवन का विधान तय करते हैं। वहीं धाता उन नियमों को संसार में स्थापित और लागू करते हैं।
जब सृष्टि में समय-चक्र और महीनों का विभाजन किया गया, तब इन दोनों भाइयों को 'द्वादश आदित्यों' (12 आदित्यों) में स्थान मिला। सूर्य देव के जो 12 स्वरूप वर्ष के 12 महीनों का संचालन करते हैं, उनमें 'धाता' और 'विधाता' भी शामिल हैं। वे अपनी किरणों से पृथ्वी पर जीवन, अन्न और ऊर्जा का संतुलन बनाए रखते हैं।
इन दोनों भाइयों का विवाह सुमेरु पर्वत की दो परम गुणी कन्याओं से हुआ था। इनके वंश की कहानी सनातन धर्म के सबसे महान और अमर ऋषियों से जुड़ती है।
धाता का विवाह- इनका विवाह सुमेरु-पुत्री 'आयति' से हुआ। इनके गर्भ से 'प्राण' नाम के तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। आगे चलकर इसी वंश में महान मार्कण्डेय ऋषि (जिन्हें साक्षात महामृत्युंजय मंत्र सिद्ध था और जो अमर हैं) का प्राकट्य हुआ।
विधाता का विवाह- इनका विवाह सुमेरु की दूसरी पुत्री 'नियति' से हुआ। इनके गर्भ से 'मृकण्डु' नाम के महान ऋषि का जन्म हुआ।
आगे की कथा महर्षि मृकण्डु की
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महर्षि मृकण्डु का विवाह परम रूपवती और पतिव्रता मरुद्वती से हुआ था। विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी उन्हें कोई संतान नहीं हुई। संतान न होने के कारण दोनों पति-पत्नी अत्यंत दुखी रहते थे। अंततः, महर्षि मृकण्डु ने अपनी पत्नी के साथ वन में जाकर साक्षात देवाधिदेव महादेव (शिव जी) की कठोर तपस्या करने का निश्चय किया।
उन्होंने वर्षों तक बिना अन्न-जल के केवल वायु पीकर तप किया। उनकी निष्कपट और घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान आशुतोष (शिव जी) प्रकट हुए और बोले, "हे मृकण्डु! तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मांगो, क्या वरदान मांगते हो?
महर्षि मृकण्डु ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु! मुझे एक श्रेष्ठ संतान (पुत्र) प्राप्ति का वरदान दीजिए।"
भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए उनके सामने एक अत्यंत कठिन धर्मसंकट (शर्त) रख दिया। शिव जी ने कहा:
"हे ऋषि! मैं तुम्हें दो विकल्प देता हूँ—
पहला विकल्प यह है कि तुम्हें एक ऐसा पुत्र मिले जो दीर्घायु हो (यानी सैकड़ों वर्ष जिए), परंतु वह पूरी तरह गुणहीन, मूर्ख और दुराचारी हो।
दूसरा विकल्प यह है कि तुम्हें एक ऐसा पुत्र मिले जो परम ज्ञानी, सर्वगुण संपन्न और साक्षात मेरा ही अंश हो, परंतु उसकी आयु केवल १६ वर्ष (अल्पायु) की हो।
अब तुम स्वयं चुनो कि तुम्हें कैसा पुत्र चाहिए।
महर्षि मृकण्डु गहरे विचार में पड़ गए। उन्होंने अपनी पत्नी से विमर्श किया और दोनों ने मिलकर निर्णय लिया, "प्रभु! हमें मूर्ख और दीर्घायु पुत्र नहीं चाहिए जो हमारे कुल को कलंकित करे। हमें भले ही अल्पायु पुत्र मिले, पर वह गुणी और धार्मिक होना चाहिए।"
शिव जी ने कहा—"एवमस्तु!" और वे अंतर्ध्यान हो गए।
बालक मार्कण्डेय का जन्म और बढ़ता संकट
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समय आने पर माता मरुद्वती के गर्भ से एक अत्यंत तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम महर्षि मृकण्डु के नाम पर 'मार्कण्डेय' रखा गया।
मार्कण्डेय बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। वे अल्पायु में ही वेदों, शास्त्रों और योग विद्या में पारंगत हो गए। वे हर समय भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते थे। जैसे-जैसे मार्कण्डेय बड़े हो रहे थे, माता-पिता की आँखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, क्योंकि उनके पुत्र की आयु का १६वां वर्ष अब समाप्त होने की कगार पर था।
जब मार्कण्डेय ने अपने माता-पिता को इस कदर रोते देखा, तो उन्होंने इसका कारण पूछा। तब महर्षि मृकण्डु ने भारी मन से शिव जी के उस वरदान और उनकी १६ वर्ष की अल्पायु का पूरा सत्य अपने पुत्र को बता दिया।
माता-पिता की बात सुनकर बालक मार्कण्डेय डरे नहीं। उन्होंने कहा, "पिताजी! जिन्होंने मुझे यह जीवन दिया है, उन महादेव पर मुझे पूरा विश्वास है। मैं मृत्यु को जीत कर दिखाऊंगा।"
मार्कण्डेय तुरंत समुद्र तट पर गए और वहाँ मिट्टी से एक दिव्य शिवलिंग की स्थापना की। वे साक्षात 'महामृत्युंजय मंत्र' का मानसिक जाप करते हुए शिव जी की आराधना में पूरी तरह खो गए।
तभी वह घड़ी आ गई जब मार्कण्डेय के जीवन के १६ वर्ष पूरे हो गए। साक्षात यमराज अपने भयानक भैंसे पर सवार होकर, हाथ में यमपाश (मृत्यु का फंदा) लिए बालक मार्कण्डेय के प्राण हरने के लिए प्रकट हुए। यमराज को देखकर पूरी प्रकृति कांप उठी, लेकिन मार्कण्डेय का ध्यान नहीं भटका। वे ज़ोर से रोते हुए शिवलिंग से लिपट गए।
यमराज ने कहा, "हे बालक! तुम्हारा समय पूरा हो चुका है। इस शिवलिंग को छोड़ो और मेरे साथ यमलोक चलो।" जब मार्कण्डेय ने शिवलिंग को नहीं छोड़ा, तो क्रोधित होकर यमराज ने जैसे ही अपना यमपाश फेंका, वह फंदा बालक के साथ-साथ उस शिवलिंग पर भी जा गिरा।
साक्षात महादेव के प्रतीक शिवलिंग पर यमपाश का गिरना भगवान शिव का घोर अपमान था। उसी क्षण, वह मिट्टी का शिवलिंग कड़कड़ाती बिजली के साथ फट गया और उसके भीतर से साक्षात रौद्र रूप में भगवान त्रिनेत्रधारी शिव (कालभैरव) प्रकट हुए!
शिव जी का क्रोध देखकर यमराज थर-थर कांपने लगे। शिव जी ने अपनी त्रिशूल से यमराज के छाती पर प्रहार किया (कुछ कथाओं में शिव जी द्वारा यमराज को दंडित करने का वर्णन है) और गरजते हुए बोले, "हे यम! तुम्हारी यह धृष्टता कि तुमने मेरे परम भक्त और मेरे ही स्वरूप पर पाश डाला? इस बालक के भाग्य के विधाता तुम नहीं, स्वयं मैं हूँ।
यमराज ने तुरंत अपने हाथ जोड़े और क्षमा मांगी, "प्रभु! मैं तो केवल सृष्टि के नियम (काल चक्र) का पालन कर रहा था। मुझे क्षमा करें।"
भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने बालक मार्कण्डेय को अपने गले से लगा लिया और उन्हें वरदान दिया ।
"हे मार्कण्डेय! तुम्हारी भक्ति ने विधाता के लिखे लेख को भी बदल दिया है। आज से तुम 'कालजयी' (सदा अमर) रहोगे। तुम्हारी आयु कभी समाप्त नहीं होगी और तुम सात कल्पों तक जीवित रहकर इस सृष्टि के बदलते स्वरूप को देखोगे। जब प्रलय काल में सब कुछ नष्ट हो जाएगा, तब भी तुम जीवित रहोगे।〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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