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धरती पर बढ़ रहा, आबादी का भार

धरती पर बढ़ रहा, आबादी का भार

कुमार महेंद्र
आज विश्व जनसंख्या दिवस पर,
आओ मिल संकल्प उठाएँ।
बढ़ती जनसंख्या के संकट से,
सोए जन-मन को जगाएँ।
घटते वन, उजड़ते उपवन,
व्याकुल है सारा संसार।
धरती पर बढ़ रहा, आबादी का भार।।


सीमित साधन, असीमित चाहत,
कब तक होगा यह विस्तार?
भूख, गरीबी, बेरोज़गारी,
दे रही मानव को ललकार।
भावी पीढ़ी से छीन रहे हम,
जीवन का हर अधिकार।
धरती पर बढ़ रहा, आबादी का भार।।


यह धरा नहीं केवल मानव की,
हर प्राणी का है अधिकार।
स्वार्थाग्नि में अंधा होकर,
क्यों करता प्रकृति पर प्रहार?
शुद्ध जल और निर्मल वायु पर,
मंडरा रहा संकट अपार।
धरती पर बढ़ रहा, आबादी का भार।।


आओ अब जागें, जग को जगाएँ,
जन-जन तक संदेश पहुँचाएँ।
छोटा परिवार, सुख का आधार,
हर घर में यह मंत्र सुनाएँ।
शिक्षा, संयम और जागरूकता,
बनें विकास की दृढ़ पतवार।
धरती पर बढ़ रहा, आबादी का भार।।


आठ अरब की सीमा लाँघी,
मानव का बढ़ता विस्तार।
सीमित धरती, सीमित संसाधन,
कब तक सहेगी यह भार?
हर वर्ष करोड़ों नवजीवन जुड़ते,
घटते जाते संसाधन-भंडार।
धरती पर बढ़ रहा, आबादी का भार।।


नौ अरब की ओर बढ़ रहे,
अब भी यदि हम रहे अनजान।
आने वाली हर पीढ़ी हमसे,
माँगेगी इसका स्पष्ट बयान।
युवा शक्ति! अब आगे बढ़ो,
बनो राष्ट्र के सच्चे पहरेदार।
धरती पर बढ़ रहा, आबादी का भार।।


आओ ऐसा कल रच डालें,
धरती फिर से मुस्काए।
संतुलित जनसंख्या के संग,
हर जीवन खुशियाँ पाए।
यही समय की प्रखर पुकार,
संतुलित जनसंख्या ही, समृद्धि का आधार।
धरती पर बढ़ रहा, आबादी का भार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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