मगही गजल
रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"*मतला*
जेतने बढ़ल हे लोभ लालच, ओतने आपस में दूरी हे,
सुख-शांति अगर चाहत हव त, मन में संतोष जरूरी हे।
*शेर - २*
महल के भीतर ताक के देखऽ, सबके चेहरे पर उदासी हे,
झोपड़पट्टी में जाके देखऽ, कइसन सुंदर सबूरी हे।
*शेर - ३*
धन-दौलत के माया में इहाँ, फँसल दुनिया घनेरी हे,
प्रेम के दीया जे रोज जरावे, ओकरे जिनगी उजेरी हे।
*शेर - ४*
जात-पात के ऊँच-नीच से, सोच भइल अँधेरी हे,
नेह-मोहब्बत के गंध जहाँ, माटी ओहिजा कस्तूरी हे।
*शेर - ५*
झूठ-फरेब के बादर छाएल, डगर भइल अँधेरी हे,
साँच के दीपक जरत रहे त, मंजिल सुघर-सुनेहरी हे।
*शेर - ६*
क्रोध-अहं के आग में जरल, घर-आँगन सब अँधेरी हे,
मीठ बचन के छाँव मिले त, दूर होवे हर बेरी हे।
*शेर - ७*
समय नदी के धार नियन चाल एकर बहुते टेढ़ी हे,
जे आजे के काम निपटावे, सफलता ओकरे चेरी हे।
*शेर - ८*
अपना खातिर जीए वाला त, मिल जइहें इहाँ ढेरी हे,
दूजा खातिर जे झुक जाला, ओकरे में दिलेरी हे।
*मक्ता*
'राकेश' मन के दर्पन देखऽ, काहे दुनिया मजबूरी हे,प्रेम बिना ई जग के चमक, लागे खाली मजूरी हे।
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