"दूर की ज्योति, पास की सुगंध"

"दूर की ज्योति, पास की सुगंध"

पंकज शर्मा
मनुष्य का स्वभाव प्रायः दूरस्थ उपलब्धियों की ओर आकृष्ट होता है। वह ऊँचे शिखरों, दुर्लभ सफलताओं एवं भविष्य की संभावनाओं के पीछे इतना तन्मय होकर दौड़ता है कि वर्तमान में बिखरे जीवन-सौंदर्य को देखना भूल जाता है। आकाश के तारों तक पहुँचने की आकांक्षा प्रेरक अवश्य है, किन्तु जब वही आकांक्षा हमारी दृष्टि को इतना ऊर्ध्वमुखी बना दे कि हम अपने आसपास उपस्थित प्रेम, संबंध, प्रकृति एवं सरल सुखों की उपेक्षा करने लगें, तब वह उपलब्धि नहीं, एक सूक्ष्म अभाव का कारण बन जाती है।

मित्रों जीवन का वास्तविक वैभव केवल उन ऊँचाइयों में नहीं है जिन्हें हम पाना चाहते हैं, बल्कि उन क्षणों में भी है जो प्रतिदिन हमारे समीप चुपचाप खिलते रहते हैं। एक फूल की सुगंध, किसी प्रिय का स्नेह, आत्मिक शांति का एक क्षण—ये सब जीवन की वे विभूतियाँ हैं जिन्हें पहचानने के लिए ऊपर नहीं, भीतर एवं आसपास देखना पड़ता है। जो व्यक्ति दूर के प्रकाश एवं निकट के सौंदर्य के बीच संतुलन स्थापित कर लेता है, वही जीवन की कला को उसके सम्पूर्ण अर्थ में जी पाता है।

स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित

✍️ "कमल की कलम से"✍️ 
 (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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