प्रकृति की पाठशाला
सत्येन्द्र कुमार पाठक
जून का महीना था और सूरज देवता अपने पूरे तेवर में थे। स्कूलों में गर्मी की छुट्टी हो चुकी थी। ८ वर्ष का डुग्गू, ६ वर्ष का पुच्चू और उनकी छोटी बहन ५ वर्ष की पीहू, तीनों शहर की भागदौड़ से दूर अपने गांव ‘हरीपुर’ आए थे। उनके लिए गांव का मतलब था—मम्मी-पापा के साथ ढेर सारी मस्ती और दादाजी का वह पुराना, हवादार और बड़ा सा दालान। दादाजी का दालान कोई साधारण जगह नहीं थी। वहाँ ठंडी-ठंडी हवा चलती थी, मिट्टी की सोंधी खुशबू आती थी और सबसे बढ़कर, वहाँ दादाजी की ज्ञान की पोटली खुलती थी।
एक सुबह, दालान में पीपल और बरगद के विशाल पेड़ों की ठंडी छांव बिखरी हुई थी। तभी अचानक कहीं से जोर-जोर से कांव-कांव की आवाज आने लगी। पीहू ने चिढ़कर अपने कान बंद कर लिए, "धत्तरे की! यह कौवा कितना गंदा गाता है। मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं।"
पास ही बैठे दादाजी मुस्कुराए और पीहू को अपनी गोद में बिठाते हुए बोले, "अरे छोटी बिटिया, ऐसा नहीं कहते। भले ही कौवे की आवाज सुरीली नहीं होती, लेकिन वह हमारा बहुत अच्छा दोस्त है। वह हमारे आसपास की गंदगी साफ करता है। और जानते हो, वह बहुत बुद्धिमान और मिलनसार भी होता है।"
"सच में दादाजी?" डुग्गू और पुच्चू भी अपनी कॉमिक्स छोड़कर पास आ गए।
"हाँ बच्चों! और जरा सामने देखो, उस शीशम की डाल पर कौन बैठा है?" दादाजी ने इशारा किया।
वहाँ एक हरे रंग का तोता और एक भूरे रंग की मैना आपस में गुटरगू कर रहे थे। कुछ ही दूरी पर एक सुंदर मोर अपने पंख समेटे खड़ा था। मम्मी रसोई से ठंडे-ठंडे आम और अमरूद काटकर लाईं। पापा ने कहा, "बच्चों, यह देखो, यह फल हमारे बगीचे के हैं। इस गर्मी में पेड़ हमें मीठे फल भी देते हैं और ठंडी हवा भी।" पुच्चू ने अमरूद का टुकड़ा मुंह में डालते हुए पूछा, "पापा, क्या पेड़ सिर्फ फल देते हैं?" पापा ने समझाया, "नहीं पुच्चू, ये जो पीपल, बरगद और शीशम के पेड़ हैं, ये हमें ऑक्सीजन देते हैं जिससे हम सांस लेते हैं। और वह देखो, दूर जो महुआ के पेड़ हैं, उनके फूलों से दवाइयां और स्वादिष्ट पकवान बनते हैं।"
दोपहर ढलने लगी तो दादाजी ने कहा, "चलो बच्चों, आज तुम्हें गाँव की असली पाठशाला ले चलते हैं—प्रकृति की पाठशाला!"पापा ने गाड़ी तैयार की और सब घूमने निकले। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें ऊंचे-ऊंचे पर्वत दिखाई दिए। पर्वत इतने ऊंचे थे मानो आसमान को छू रहे हों। पर्वतों के बीच से एक कलकल करती नदी बह रही थी।
डुग्गू ने पूछा, "दादाजी, यह नदी कहाँ से आती है?" दादाजी ने बताया, "डुग्गू, ये नदियाँ इन ऊंचे पर्वतों पर जमी बर्फ के पिघलने से बनती हैं। नदी का पानी मीठा होता है, जो खेतों की प्यास बुझाता है और हमें पीने का पानी देता है।" नदी के किनारे हरी-भरी घास चर रही गाय, मजबूत बैल और पानी में आनंद लेती भैंस दिखाई दीं। वहीं पास में एक सफेद घोड़ा शान से दौड़ रहा था। दादाजी ने बच्चों को बताया, "यह गाय हमें पौष्टिक दूध देती है। बैल खेतों में किसान की मदद करते हैं और भैंस भी दूध देती है। ये सब हमारे वफादार साथी हैं।"
तभी दालान का रखवाला, उनका पालतू कुत्ता 'शेरू' भी दौड़ता हुआ वहाँ आ गया और अपनी पूंछ हिलाने लगा। पीहू ने उसे प्यार से सहलाया।
शाम होने को आई थी। सूरज की किरणें अब हल्की और सुनहरी हो गई थीं। पापा उन्हें नदी के पास ही बने एक बड़े से सरोवर (तालाब) के पास ले गए।।सरोवर का जल बिल्कुल साफ और शांत था। पानी में रंग-बिरंगी मछली तैर रही थीं। पीहू पानी में मछलियों को देखकर ताली बजाने लगी। तभी पुच्चू चिल्लाया, "देखो-देखो, पानी पर नाव जैसी कोई चीज तैर रही है!"
मम्मी ने हंसते हुए कहा, "पुच्चू, वह नाव नहीं, हंस है।" शान से तैरते हुए सफेद हंसों का जोड़ा बेहद खूबसूरत लग रहा था। दादाजी ने इस मौके पर बच्चों को एक बहुत बड़ी सीख दी। उन्होंने कहा, "बच्चों, हंस की एक बहुत बड़ी खासियत होती है। इसे 'नीर-क्षीर विवेक' कहते हैं। अगर हंस के सामने दूध और पानी मिलाकर रख दिया जाए, तो वह सिर्फ दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है।" "इसका क्या मतलब हुआ दादाजी?" डुग्गू ने उत्सुकता से पूछा। "इसका मतलब है मेरे बच्चे," दादाजी ने प्यार से डुग्गू का सिर थपथपाते हुए कहा, "कि इस दुनिया में अच्छी बातें भी हैं और बुरी बातें भी। हमें इस हंस की तरह बनना चाहिए—हमेशा अच्छी बातों (दूध) को अपनाना चाहिए और बुरी बातों (पानी) को छोड़ देना चाहिए।"
घर वापसी और ज्ञान का उपहार
रात होने लगी थी। आसमान में तारे टिमटिमाने लगे थे। सब लोग वापस दादाजी के दालान में आ गए। ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में चाँद मुस्कुरा रहा था। मम्मी ने सबको खाने के बाद मीठा-मीठा पपीता काटकर दिया। पीहू, डुग्गू और पुच्चू आज बहुत खुश थे। उन्होंने आज किताबों वाली पाठशाला से अलग, प्रकृति की सजीव पाठशाला में बहुत कुछ सीखा था। डुग्गू बोला, "दादाजी, आज मुझे समझ आया कि यह पूरी प्रकृति—ये पर्वत, नदी, सरोवर, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे—सब आपस में जुड़े हैं। अगर ये नहीं होंगे, तो हम भी नहीं बचेंगे।"
पुच्चू ने कहा, "और मैं अब से कभी किसी जानवर को तंग नहीं करूँगा और हर साल एक पेड़ जरूर लगाऊँगा।"
छोटी पीहू ने हंसते हुए कहा, "और मैं कल सुबह उठकर सबसे पहले कौवे भैया को रोटी दूँगी और तोते-मैना के लिए दालान में पानी रखूँगी।" दादाजी, मम्मी और पापा बच्चों की यह समझदारी देखकर बेहद खुश हुए। दादाजी ने तीनों को गले से लगा लिया। इस तरह गर्मी की वह छुट्टी सिर्फ खेल-कूद की नहीं, बल्कि ज्ञान और संस्कार की एक अनोखी छुट्टी बन गई।
सीख - प्रकृति की हर रचना—चाहे वह छोटा सा कौवा हो, विशाल बरगद का पेड़ हो, या बहती हुई नदी—सबका हमारे जीवन में बहुत महत्व है। हमें पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए और हमेशा हंस की तरह केवल अच्छाइयों को ग्रहण करना चाहिए।
करपी , अरवल , बिहार 804419
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