बिहार संग्रहालय में ‘गज लोक प्रदर्शनी’ का उद्घाटन, पंडित हृदय नारायण झा की पुस्तक ‘छठ लोक गीत’ का भव्य लोकार्पण

पटना, 20 जून। बिहार की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और छठ महापर्व की गौरवशाली सांस्कृतिक धारा को समर्पित एक भव्य एवं गरिमामय समारोह का आयोजन शुक्रवार को बिहार संग्रहालय, पटना में किया गया। इस अवसर पर आयोजित ‘गज लोक प्रदर्शनी’ का उद्घाटन किया गया तथा वरिष्ठ लोकगीतकार, योग विशेषज्ञ, सांस्कृतिक चिंतक एवं साहित्यकार पंडित हृदय नारायण झा द्वारा संकलित महत्वपूर्ण पुस्तक “छठ लोक गीत (सर्वसौभाग्यदायकम्)” का विधिवत लोकार्पण किया गया।

समारोह की अध्यक्षता बिहार संग्रहालय के महानिदेशक श्री अंजनी कुमार सिंह ने की। विशिष्ट अतिथियों में इंटेक (INTACH) के अध्यक्ष श्री अशोक जयराज सिंह, सेवानिवृत्त आईएएस एवं इंटेक के सदस्य सचिव श्री रविन्द्र सिंह, इंटेक की कार्यपालक निदेशक सुश्री निरुपमा वाई. माडवेल सहित अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकार, शिक्षाविद्, कला-संस्कृति विशेषज्ञ एवं सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
छठ पर्व बिहार की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक
अपने संबोधन में मंत्री डॉ. प्रमोद चंद्रवंशी ने कहा कि छठ महापर्व बिहार की सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत स्वरूप है। यह पर्व समाज में समानता, अनुशासन, आस्था और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि छठ से जुड़े लोकगीत हमारी सामूहिक स्मृतियों, पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
उन्होंने कहा कि पंडित हृदय नारायण झा द्वारा तैयार की गई यह पुस्तक केवल लोकगीतों का संग्रह नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक चेतना का दस्तावेज है। यह कृति आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर के रूप में कार्य करेगी और लोक परंपराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
बिहार की भाषाई विविधता का अनूठा दस्तावेज
लोकार्पित पुस्तक “छठ लोक गीत (सर्वसौभाग्यदायकम्)” में बिहार के विभिन्न भाषाई अंचलों—मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका और बज्जिका—में प्रचलित छठ महापर्व से संबंधित लोकगीतों का विस्तृत संकलन प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक में छठ व्रत की विभिन्न परंपराओं, लोक आस्थाओं, सूर्योपासना, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक समरसता और प्रकृति के साथ मानव के संबंधों को लोकगीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। इसमें अनेक ऐसे दुर्लभ गीतों को भी स्थान दिया गया है जो अब धीरे-धीरे लोक स्मृति से विलुप्त होने की कगार पर हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पुस्तक बिहार की बहुभाषिक एवं बहुरंगी लोकसंस्कृति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होगी। साथ ही यह लोक साहित्य, समाजशास्त्र, संस्कृति अध्ययन और लोक परंपराओं पर शोध करने वाले विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए भी उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराएगी।
वर्षों के शोध और संग्रह का परिणाम है यह पुस्तक

पुस्तक के रचनाकार पंडित हृदय नारायण झा ने अपने वक्तव्य में कहा कि छठ महापर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह लोकजीवन, प्रकृति और मानवीय मूल्यों का महापर्व है। उन्होंने कहा कि छठ के गीतों में बिहार की मिट्टी की सुगंध, लोकजीवन की संवेदनाएं, पारिवारिक रिश्तों की आत्मीयता और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
उन्होंने बताया कि इस पुस्तक को तैयार करने के लिए उन्होंने वर्षों तक बिहार के विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण किया, लोक कलाकारों, गायकों और ग्रामीण समुदायों से संवाद स्थापित किया तथा प्रचलित एवं दुर्लभ लोकगीतों का संकलन किया। लंबे अध्ययन, अनुसंधान और सांस्कृतिक साधना के बाद यह कृति अपने वर्तमान स्वरूप में सामने आई है।
‘गज लोक प्रदर्शनी’ बनी आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम के दौरान आयोजित ‘गज लोक प्रदर्शनी’ भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रही। प्रदर्शनी में भारतीय संस्कृति, लोककथाओं, धार्मिक परंपराओं और कला में हाथियों (गज) की भूमिका को विभिन्न चित्रों, कलाकृतियों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से दर्शाया गया। प्रदर्शनी ने बिहार और भारत की सांस्कृतिक विरासत के विविध आयामों को सामने रखा तथा दर्शकों को लोककला और सांस्कृतिक इतिहास से परिचित कराया।
संस्कृति संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
समारोह में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि आधुनिकता और तकनीकी युग में लोक परंपराओं एवं लोक साहित्य के संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। ऐसे समय में पंडित हृदय नारायण झा जैसे साहित्यकारों और सांस्कृतिक साधकों का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर को संजोकर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक न केवल छठ महापर्व की परंपराओं को संरक्षित करेगी, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान भी प्रदान करेगी।
साहित्यकारों, कलाकारों और संस्कृति प्रेमियों की रही उपस्थिति
इस अवसर पर साहित्य, कला, संगीत, संस्कृति और शिक्षा जगत से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्तियों, शोधकर्ताओं, लोक कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं संस्कृति प्रेमियों ने भाग लिया। सभी ने पुस्तक के प्रकाशन को बिहार की लोक-सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
समारोह के अंत में उपस्थित लोगों ने पंडित हृदय नारायण झा को उनकी दीर्घकालिक सांस्कृतिक साधना और लोक संस्कृति के संरक्षण में दिए गए योगदान के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं दीं तथा पुस्तक की व्यापक सफलता की कामना की।यह आयोजन बिहार की सांस्कृतिक चेतना, लोक परंपराओं और छठ महापर्व की गौरवशाली विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं प्रेरणादायी पहल के रूप में स्मरण किया जाएगा।
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