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मन्वंतर सांस्कृतिक अवदान और खगोलीय विरासत

मन्वंतर सांस्कृतिक अवदान और खगोलीय विरासत

सत्येन्द्र कुमार पाठक
"कालो गतिः कालः कलयति विश्वात्मा।"अर्थात् काल ही संपूर्ण सृष्टि की गति है और वही इस चराचर जगत को संचालित करता है। सनातन हिंदू संस्कृति में समय को केवल एक सीधी रेखा (Linear) में बहता हुआ नहीं माना गया है, बल्कि इसे एक चक्रीय और अनंत प्रवाह के रूप में देखा गया है। आधुनिक विज्ञान जहाँ समय और अंतरिक्ष के रहस्यों को समझने के लिए अब भी संघर्ष कर रहा है, वहीं हज़ारों वर्ष पूर्व भारत के ऋषियों-मनीषियों ने सूक्ष्म से लेकर महानतम काल-अवधियों की अचूक गणना कर ली थी। इस दिव्य खगोलीय और गणितीय व्यवस्था के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं— मन्वंतर (जो ब्रह्मांडीय और वैश्विक विकास को दर्शाता है) और संवत्सर (जो मानव जीवन, कृषि और ऋतु चक्र को प्रभावित करता है)।
मन्वंतर का शाब्दिक अर्थ है— "एक मनु का अंतर" अर्थात् किसी एक मनु का शासनकाल। हिंदू खगोल विज्ञान और पुराणों (जैसे विष्णु पुराण, सूर्य सिद्धांत और श्रीमद्भागवत) के अनुसार, सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी का एक दिन 'कल्प' कहलाता है। एक कल्प में 14 मन्वंतर होते हैं।
मन्वंतर की गणितीय गणना - सनातन गणना के अनुसार, काल की माप इस प्रकार है: एक चतुर्युगी (महायुग): सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलिंयुग को मिलाकर 43,20,000 मानव वर्ष होते हैं। एक मन्वंतर: 71 चतुर्युगी (लगभग 30,67,20,000 मानव वर्ष) का एक मन्वंतर होता है। संधिकाल: प्रत्येक मन्वंतर के अंत में एक सत्ययुग के बराबर (17,28,000 वर्ष) का संधिकाल होता है, जिसमें जल-प्रलय होती है। एक कल्प: 14 मन्वंतर और उनके संधिकालों को मिलाकर ब्रह्मा जी का एक दिन बनता है, जो 4,32,00,000 मानव वर्षों का होता है।
प्रत्येक मन्वंतर में एक नए मनु (मानव जाति के प्रणेता), नए सप्तर्षि (ज्ञान के संरक्षक), नए इंद्र (देवराज) और भगवान विष्णु का एक विशिष्ट अवतार होता है।
स्वायंभुव मन्वंतर (सृष्टि का आदिकाल) - यह कल्प का प्रथम मन्वंतर था, जब निराकार चेतना ने आकार लेना शुरू किया। : मनु स्वयं स्वायंभुव मनु थे। सप्तर्षियों में मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ शामिल थे। भगवान विष्णु 'यज्ञ' (यज्ञपुरुष) के रूप में अवतरित हुए। ब्रह्मा जी ने स्वयं वेदों का प्राकट्य किया और प्रजापतियों को वंश विस्तार का कार्य सौंपा। शिव जी के क्रोध से ११ रुद्र प्रकट हुए। आद्याशक्ति ने प्रसूति और सती के रूप में प्रकट होकर देव-संस्कृति के मातृ-पक्ष को सुदृढ़ किय इस काल में सौर और अग्नि संस्कृति की नींव पड़ी। यज्ञ को ब्रह्मांड की नाभि माना गया। जल और वरुण को सृष्टि की शुद्धि का माध्यम बनाया गया। देव, पितृ और तरु (वनस्पति) की पूजा का बीजारोपण हुआ। इस काल में असुर या राक्षस भौतिक रूप में नहीं, बल्कि केवल तामसिक प्रवृत्तियों के रूप में विद्यमान थे।
. स्वरोचिष मन्वंतर (साधना का विकास) - अग्नि पुत्र स्वरोचिष मनु थे। सप्तर्षि— ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, वात, पृषत, निरय और कृती थे। भगवान विष्णु 'विभु' नाम से प्रकट हुए। उन्होंने ऋषियों को नैष्ठिक ब्रह्मचर्य और आंतरिक तप की संस्कृति सिखाई। इस काल में वायु तत्त्व (प्राणायाम और श्वास साधना) का विकास हुआ। नाग संस्कृति का पाताल लोक में विस्तार हुआ, जिन्होंने पृथ्वी के भूगर्भीय संतुलन को संभाला। महालक्ष्मी के आशीर्वाद से कृषि और ऐश्वर्य की संस्कृति का उदय हुआ। . उत्तम मन्वंतर (सत्य और न्याय की स्थापना)- : प्रियव्रत के पुत्र उत्तम मनु इसके अधिपति थे। भगवान विष्णु का 'सत्यसेन' अवतार हुआ। उन्होंने उस समय के सत्य-विरोधियों का दमन किया।।: महासरस्वती के प्रभाव से इस काल में ज्ञान, भाषा, व्याकरण और संगीत कला का ऋषियों के बीच प्रसार हुआ। ब्रह्म संस्कृति में त्रिकाल संध्या और गायत्री उपासना को अनिवार्य अंग बनाया गया।
तामस मन्वंतर (संकट और शरणागति) - तामस मनु इसके नायक थे। सप्तर्षियों में ज्योतिर्धामा और पृथु मुख्य थे।: भगवान विष्णु 'हरि' नाम से प्रकट हुए। इसी मन्वंतर में प्रसिद्ध 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा हुई। नाम के अनुरूप इस काल में तामसिक प्रवृत्तियों (असुर, दैत्य और राक्षस) का प्रभाव बढ़ा। गजेंद्र और ग्राह के युद्ध के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि अहंकार चाहे कितना भी बलवान (जल का राजा ग्राह) हो, शरणागति से ही मोक्ष संभव है। जल तत्त्व इस काल की मुख्य सांस्कृतिक चेतना था।
. रैवत मन्वंतर (दिव्य लोकों का सृजन) - प्रमुख व्यक्तित्व: रैवत मनु इसके अधिपति थे। हिरण्यरोमा और वेदश्री जैसे महान सप्तर्षि इस काल में थे। भगवान विष्णु 'वैकुंठ' रूप में प्रकट हुए। उन्होंने अपनी योगमाया से 'वैकुंठ लोक' की रचना की। : यह काल वैष्णव संस्कृति के चरमोत्कर्ष का था। ऋषियों ने पितृ संस्कृति को सुदृढ़ किया और वायु तथा जल के माध्यम से तर्पण की पद्धतियाँ बनाईं। वनों (तरु) और औषधियों के दिव्य गुणों की खोज की गई।
चाक्षुष मन्वंतर ब्रह्मांडीय उथल-पुथल और अमूल्य रत्नों के प्राकट्य का साक्षी रहा। चाक्षुष मनु इसके स्वामी थे। भगवान विष्णु ने 'अजीत' और 'कूर्म' (कच्छप) रूप धारण किया। जब मंदराचल पर्वत डूबने लगा, तो उन्होंने उसे अपनी पीठ पर संभाला। शिव जी ने सृष्टि की रक्षा के लिए हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया और 'नीलकंठ' कहलाए । समुद्र मंथन से स्वयं महालक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्होंने श्रीहरि का वरण किया।।: इस काल में दैत्य, दानव, देव और नाग (वासुकि) एक साथ मिलकर पुरुषार्थ (मंथन) में लगे। समुद्र (जल) संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र बना। धन्वंतरि के रूप में आयुर्वेद का अवदान इसी काल की देन है।
वैवस्वत मन्वंतर में हम आज जी रहे हैं। यह इतिहास, संस्कृति और अवतारों की दृष्टि से सबसे समृद्ध माना जाता है। सूर्यपुत्र विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु इसके अधिपति हैं। वर्तमान सप्तर्षि हैं— कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज।। इस मन्वंतर के प्रारंभ में प्रलय से वेदों को बचाने के लिए भगवान ने मत्स्य अवतार लिया। इसके बाद वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम और श्रीकृष्ण के ऐतिहासिक अवतार इसी मन्वंतर में हुए।।महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती ने महिषासुरमर्दिनी, सती-पार्वती, सीता और राधा के रूप में अवतरित होकर शाक्त परंपरा को जन-जन तक पहुँचाया। शिव जी ने हनुमान के रूप में भक्ति की पराकाष्ठा का आदर्श प्रस्तुत किया। इस काल में सौरवंश और चंद्रवंश के माध्यम से आदर्श राजधर्म की स्थापना हुई। गंगावतरण के द्वारा जल संस्कृति, तुलसी-पीपल-वट पूजा के माध्यम से तरु संस्कृति, और वैदिक ऋचाओं के माध्यम से ब्रह्म व वैष्णव संस्कृति का पूर्ण वैज्ञानिक ढांचा समाज को मिला। नागों (कालिया मर्दन, तक्षक) और असुरों (रावण, कंस) के साथ संघर्ष के माध्यम से 'यतो धर्मस्ततो जयः' का सिद्धांत स्थापित हुआ।
वैवस्वत मन्वंतर के बाद आने वाले मन्वंतर में सावर्णि मन्वंतर: इसके मनु सावर्णि होंगे। भगवान विष्णु 'सार्वभौम' रूप में अवतार लेंगे। वर्तमान में पाताल लोक के राजा और परम वैष्णव महाबली बलि इस मन्वंतर में देवराज इंद्र का पद सुशोभित करेंगे, जिससे दानव संस्कृति का एक अत्यंत धार्मिक और गौरवशाली रूप सामने आएगा। अश्वत्थामा, कृपाचार्य और व्यास जी इस काल के सप्तर्षि होंगे।। दक्ष-सावर्णि मन्वंतर: इसके मनु दक्ष-सावर्णि होंगे। भगवान 'ऋषभ' रूप में अवतार लेंगे। यहाँ ब्रह्म और शैव साधना के नए आयाम स्थापित होंगे। ब्रह्म-सावर्णि मन्वंतर: भगवान 'विष्वक्सेन' के रूप में प्रकट होंगे। इस काल में प्रकृति और जल के संरक्षण की दिव्य, विस्मृत पद्धतियाँ पुनः जीवित होंगी। धर्म-सावर्णि मन्वंतर: भगवान 'धर्मसेतु' नाम से अवतार लेकर लुप्त हो चुके धर्म और सदाचार की रक्षा करेंगे। इसमें सौर और शाक्त संप्रदायों का विशेष अवदान होगा। रुद्र-सावर्णि (या रौच्य) मन्वंतर: इस काल के मनु रौच्य होंगे। भगवान 'स्वधामा' रूप में अवतरित होंगे। यह काल रुद्र की प्रधानता वाला होगा, इसलिए शैव और पितृ संस्कृति का प्रभाव चरम पर होगा। सभी सप्तर्षि (तपस्वी, तपोमूर्ति आदि) केवल उग्र तपस्या में लीन रहेंगे। देव-सावर्णि मन्वंतर: इसके मनु देव-सावर्णि होंगे। भगवान 'योगेश्वर' रूप में अवतरित होकर संपूर्ण ब्रह्मांड में योग और अध्यात्म का साम्राज्य स्थापित करेंगे। इंद्र-सावर्णि (या भौत्य) मन्वंतर: यह इस कल्प का अंतिम मन्वंतर होगा। भगवान विष्णु 'बृहद्भाणु' (महाकल्प सूर्य) के रूप में प्रकट होंगे। इस मन्वंतर के अंत में रुद्र का तांडव रूप जाग्रत होगा। अग्नि, वायु और जल (महाप्रलय) के माध्यम से समस्त देव, असुर, नाग, तरु और मानव संस्कृति पुनः ब्रह्मा जी के कारण-जल में विलीन हो जाएगी, ताकि अगले कल्प में नई सृष्टि का उदय हो सके।
: संवत्सर व्यवस्था – समय का व्यावहारिक और मानवीय चक्र में जहाँ मन्वंतर महा-काल की गणना है, वहीं संवत्सर हमारे दैनिक जीवन, संक्रांति, पर्वों और कृषि का आधार है। संवत्सर का साधारण अर्थ है— "वर्ष"। हिंदू पंचांग के अनुसार, बृहस्पति (Jupiter) की गति के आधार पर ६० संवत्सरों का एक चक्र (60-Year Cycle) होता है। जब बृहस्पति एक राशि को पार करता है, तो एक संवत्सर पूरा होता है। इन ६० संवत्सरों को तीन हिस्सों में बांटा गया है, जो त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की शक्तियों को दर्शाते हैं। संवत्सरों का वर्गीकरण - १ से २० (प्रभव आदि): ये ब्रह्मा जी के नियंत्रण में हैं। ये सृष्टि और रचनात्मकता के प्रतीक हैं। २१ से ४० (सर्वजीत आदि): ये भगवान विष्णु के नियंत्रण में हैं। ये पालन, पोषण और ऐश्वर्य के प्रतीक हैं। ४१ से ६० (प्रमादी आदि): ये भगवान रुद्र (शिव) के नियंत्रण में हैं। ये परिवर्तन, संहार और पुनर्चक्रण के प्रतीक हैं।
साठ संवत्सरों के नाम और उनके प्रतीकात्मक प्रभाव को दर्शाया गया है:
क्र.सं. संवत्सर का नाम सामान्य फल और सांस्कृतिक प्रभाव
१ प्रभव नई योजनाओं की शुरुआत, प्रजा में सुख और समृद्धि।
२ विभव ऐश्वर्य और वैभव की वृद्धि, कलात्मक विकास।
३ शुक्ल अनाज की प्रचुरता, वर्षा की अनुकूलता।
४ प्रमोद समाज में आनंद, उत्सव और शांति का माहौल।
५ प्रजापति संतान वृद्धि, कृषि और पशुपालन में उन्नति।
६ अंगिरा धार्मिक कार्यों में रुचि, ज्ञान का प्रसार।
७ श्रीमुख व्यापार में लाभ, मुख पर तेज और यश की वृद्धि।
८ भाव सात्त्विक विचारों का उदय, परोपकार की भावना।
९ युवा युवाओं का उत्थान, देश की शक्ति में वृद्धि।
१० धाता प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता, संतोष।
११ ईश्वर आध्यात्मिक चेतना का विकास, न्याय व्यवस्था सुदृढ़।
१२ बहुधान्य अत्यधिक अन्न का उत्पादन, किसानों के लिए उत्तम।
१३ प्रमाथी साहस और पराक्रम में वृद्धि, कुछ अशांति संभव।
१४ विक्रम राजाओं/नेताओं के प्रभाव में वृद्धि, विजय।
१५ वृषभास (वृष) धार्मिक यज्ञों और गोवंश की वृद्धि।
१६ चित्रभानु कला, साहित्य और रचनात्मकता का विकास।
१७ सुभानु उत्तम स्वास्थ्य और समाज में भाईचारे का संदेश।
१८ तारण संकटों से मुक्ति, जल परिवहन में सुधार।
१९ पार्थिव पृथ्वी तत्त्व मजबूत, भवन निर्माण और भूमि लाभ।
२० व्यय आर्थिक उतार-चढ़ाव, दान-पुण्य में खर्च।
२१ सर्वजीत राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा, शत्रुओं पर विजय।
२२ सर्वधारी सभी इच्छाओं की पूर्ति, जल संसाधनों का संचय।
२३ विरोधी वैचारिक मतभेद, राजनीतिक उथल-पुथल।
२४ विकृति रोगों का प्रकोप, प्रकृति में अप्रत्याशित बदलाव।
२५ खर कड़क स्वभाव, न्यायप्रियता, कड़ा अनुशासन।
२६ नंदन पारिवारिक सुख, संतों का समागम।
२७ विजय व्यापार और न्याय के क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलता।
२८ जय आत्मविश्वास में वृद्धि, शत्रुओं का पराभव।
२९ मन्मथ प्रेम, विवाह और सौंदर्य कलाओं का विस्तार।
३० दुर्मुख कठोर वाणी, समाज में कटुता का भय।
३१ हेमलम्बी सुवर्ण (सोने) और धातुओं के व्यापार में लाभ।
३२ विलम्बी कार्यों में थोड़ी सुस्ती, धैर्य की परीक्षा।
३३ विकारी मौसम में अनिश्चितता, मानसिक चिंताएँ।
३४ शार्वरी रात्रि कालीन साधनाओं (तंत्र-शाक्त) का महत्व।
३५ प्लव प्रचुर वर्षा, नदियों में जल स्तर की वृद्धि।
३६ शुभकृत शुभ कार्यों (मुंडन, विवाह, गृहप्रवेश) की अधिकता।
३७ शोभन समाज की आंतरिक सुंदरता और नैतिकता का उत्थान।
३८ क्रोधी क्रोध और उत्तेजना की वृद्धि, कूटनीतिक तनाव।
३९ विश्वावसु वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान।
४० पराभव अहंकारी शक्तियों का पतन, सत्ता परिवर्तन।
४१ प्लवंग चंचलता, यात्राओं और देशाटन में वृद्धि।
४२ कीलक एकता और दृढ़ता, संधियों का निर्माण।
४३ सौम्य सौम्य वातावरण, शिक्षा और विज्ञान की प्रगति।
४४ साधारण मध्यम फलदायी, जीवन में संतुलन की आवश्यकता।
४५ विरोधकृत विरोध प्रदर्शन, श्रम संगठनों का उत्थान।
४६ परिधावी वस्त्र उद्योग और फैशन जगत में बड़ा बदलाव।
४७ प्रमादी आलस्य की प्रवृत्ति, स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने का काल।
४८ आनंद आत्मिक संतोष, संतों की वाणियों का प्रभाव।
४९ राक्षस तामसिक भोजन और प्रवृत्तियों के प्रति आकर्षण।
५० अनल (अग्नि) गर्मी की अधिकता, अग्नि दुर्घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता।
५१ पिंगल कूटनीति में चतुरता, गुप्तचर व्यवस्था मजबूत।
५२ कालयुक्त समय का चक्र तीव्र गति से घूमना, तकनीकी क्रांति।
५३ सिद्धार्थी इच्छाओं की सिद्धि, नए आविष्कारों की सफलता।
५४ रौद्र उग्र मौसम, आंधी-तूफान, शिव आराधना से शांति।
५५ दुर्मति कुबुद्धि का नाश, सही निर्णय लेने की चुनौती।
५६ दुंदुभी विजय नाद, संगीत और वाद्य यंत्रों का सम्मान।
५७ रुधिरोद्गारी चिकित्सा विज्ञान और रक्त संबंधी शोधों में प्रगति।
५८ रक्ताक्ष क्रोध और युद्ध जैसी परिस्थितियाँ, शांति प्रयासों की जरूरत।
५९ क्रोधन आंतरिक वैमनस्य का अंत, कड़े फैसलों का वर्ष।
६० क्षय पुराने संचित कर्मों का क्षय, नई सृष्टि की तैयारी।
मन्वंतर और संवत्सर का दार्शनिक व व्यावहारिक समन्वय
सनातन धर्म की यही सबसे बड़ी विशेषता है कि वह विज्ञान को दर्शन से और दर्शन को दैनिक आचरण से जोड़ता है। जब हम संकल्प पाठ करते हैं: "ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे..."
तब हम केवल कुछ शब्द नहीं बोल रहे होते, बल्कि हम अनंत ब्रह्मांड में अपनी वर्तमान स्थिति को रेखांकित कर रहे होते हैं। मन्वंतर और संवत्सर की इस महा-गणना में भारत की पाँच प्रमुख आध्यात्मिक धाराएँ एकाकार हो जाती हैं:। सौर संस्कृति: सूर्य को समय का साक्षात् देवता (प्रत्यक्ष नारायण) मानकर उनकी रश्मियों से ऋतुओं और संवत्सरों का निर्धारण होता है।।ब्रह्म संस्कृति: प्रजापतियों और सप्तर्षियों के माध्यम से ज्ञान, वेदों, उपनिषदों और गोत्र परंपरा को एक मन्वंतर से दूसरे मन्वंतर तक पहुँचाया जाता है।।वैष्णव संस्कृति: जब-जब काल के प्रभाव से धर्म शिथिल होता है, तब-तब श्रीहरि (जैसे मत्स्य, कूर्म, राम, कृष्ण) अवतार लेकर संस्कृति के बीज को सुरक्षित रखते हैं। शैव संस्कृति: काल के नियंत्रक स्वयं 'महाकाल' (शिव) हैं। संवत्सरों का अंतिम भाग और मन्वंतरों का प्रलय काल शिव की संहारक और शोधक शक्ति के बिना अधूरा है।
शाक्त संस्कृति: समय की इस संपूर्ण गतिशीलता के पीछे जो मूल ऊर्जा (Energy) है, वह आदि शक्ति महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की ही लीला है। समुद्र मंथन से लक्ष्मी का प्रकट होना हो या दुर्गम असुरों के संहार के लिए महाकाली का प्राकट्य, शक्ति ही काल को गति देती है।
वायु और जल: मन्वंतरों के संधिकाल में प्रलय जल के माध्यम से होती है और जीवन का पुनः संचार वायु और जल के संतुलन से होता है। हमारे संवत्सरों के फल पूरी तरह वरुण (वर्षा) और पवन की गति पर निर्भर करते हैं।
तरु (वनस्पति) और प्रकृति: पीपल, वटवृक्ष और तुलसी को मन्वंतरों से परे 'अक्षय' माना गया है, जो पर्यावरण को प्राणवायु प्रदान करते हैं। नाग और असुर: ये ब्रह्मांड की पूरक शक्तियां हैं। वासुकि नाग के बिना समुद्र मंथन संभव नहीं था और राजा बलि के बिना आगामी सावर्णि मन्वंतर की परिकल्पना अधूरी है। यह दर्शाता है कि सनातन संस्कृति में किसी का सर्वनाश नहीं, बल्कि सबका शुद्धिकरण और रूपांतरण होता है।
आधुनिक संदर्भ में इस विरासत की प्रासंगिकता का आज जब दुनिया पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है, तब सनातन मन्वंतर और संवत्सर की व्यवस्था हमें एक वृहद् दृष्टिकोण (Broader Perspective) प्रदान करती है। यह हमें सिखाती है कि: संकट चाहे कितना भी बड़ा हो (जैसे तामस या राक्षस संवत्सर), वह स्थायी नहीं है। समय का चक्र बदलेगा और 'आनंद' व 'प्रभव' पुनः लौटेंगे। मानव जीवन इस अनंत ब्रह्मांड का एक अत्यंत सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रकृति (तरु, जल, वायु) के साथ तालमेल बिठाकर ही हम इस संवत्सर चक्र का सर्वोत्तम आनंद ले सकते हैं। मन्वंतर और संवत्सर की यह लोकप्रिय विरासत केवल पंचांग के पन्नों तक सीमित नहीं है; यह हमारे ऋषियों का वह दिव्य उपहार है जो हमें हर पल याद दिलाता है कि हम उस अमर अविनाशी चेतना के अंश हैं, जो युगों-युगांतरों से इस धरती पर ज्ञान, कला, विज्ञान और मानवता की संस्कृति को सींच रही है।
करपी, अरवल , बिहार 804419
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