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अपनापन

अपनापन

जय प्रकाश कुवंर
हमने बचपन में वो जमाना देखा है,
जब पड़ोसी भी अपना हुआ करते थे।
आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर देखते हैं,
परिवार वाले भी आपस में पड़ोसी बन गये हैं।।
कहाँ गया वो अपनत्व, मर गया वो संस्कार।
जिसे बुजुर्गों ने सहेज कर रखा था,
आज बिखर गया रिश्तों में हर परिवार।।
अब लगता नहीं कौन सगा है, और
कौन किसका भाई है।
आज झूठ और फरेब के रिश्तों की,
हर जगह दुहाई है।।
हम वसुधैव कुटुंबकम का पाठ पढ़ने वाले,
आज सहोदर भाई को अपना नहीं मानते हैं।
पश्चिमी सभ्यता ने ऐसा हम पर असर डाला,
अपने सगों को हम नहीं पहचानते हैं।।
सभी तो अपना कमा खा रहे हैं,
बस जरूरत है, अपनापन का रिश्ता तो निभाओ।
अभी बहुत दूर नहीं गए हो पूरब वालों,
पश्चिमी सभ्यता से मुड़कर पूरब की ओर आ जाओ।।

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