Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

ज्येष्ठ मास महात्मय {इक्कीसवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {इक्कीसवां अध्याय}

आनन्द हठीला
दत्तात्रेयजी बोले कि हे राजन् ! सुनिये, मैं विधिपूर्वक एव्रत को कहूँगा। हे नृप । दशमी के दिन प्रातःकाल उठकर शौचविधि को करे ॥ १ ॥
काष्ठ को दतुअन का त्यागकर पके हुये पत्रों से दांतों को शुद्ध करे । महानदी में मन्त्रपाठ पुर्वक पञ्चगव्य से स्नान करे ॥ २ ॥
सन्ध्यादिक कर्मकर शुक्ल वत्र पहिनकर गृह को जाय उदुम्बर (गूलर) के पात्र में जल पूर्णकर उत्तर मुख हो जाय ॥ ३ ॥
और देश काल का उच्चारण कर ब्राह्मणों को प्रणामकर कहे कि हे देवेश ! आज भक्ति से आपका उत्तम व्रत करूंगा ॥ ४ ॥
हे राजन् ! दशमी के दिन परान्न (दूसरे का अन्न), दो बार भोजन, आमिष (मांस), वपन (चौर), और शरीर में तैल का अभ्यञ्जन (लगाना) त्याग दे ॥ ५ ॥
हे राजन् ! हविष्यान्न के अतिरिक्त सभी पदार्थ आमिष कहे गये है। इस लिये दशमी के दिन सब प्रयत्न से थोड़ा हविष्यान्न भोजन करे ॥ ६ ॥
रात्रि मे कथाश्रवण आदि के द्वारा जागरण करे, वाद अरुणो-दय होने पर निर्मल जल से स्नान करे ॥ ७ ॥
पूजागृह में आकर नित्य सन्ध्यादिक कर्म को करे। एकादशी के दिन चित्त में किसी तरह का विकार न हो, और प्राकृत विषयों में मन को न लगावे ॥ ८ ॥
और सहस्रनाम को कहकर तुलसीदल से विष्णु भगवान् का पूजन करे, तथा पुरुषसूक्त और पवमान मन्त्रों से जनार्दन भगवान् का अभिषेक करे ॥ ९ ॥
औषध, मिथ्या भाषण, शयन, स्त्री के साथ निगाहचार और भाषण, क्रोध, कटुवचन, आलाप, काष्ठ के दतुअन से दांतों का मर्दन ॥ १० ॥

एकादशी के दिन व्रतफल को चाहने वाले इन कामों को न करें और प्रत्येक प्रहर में चक्रपाणि विष्णु भगवान् का पूजन करना चाहिये ॥ ११ ॥

इस तरह गीत (गान) 'वादित्र (वाद्य) के द्वारा अहोरात्र (दिन रात) इस उत्सव को करे। दूसरे दिन प्रातःकाल जितनी द्वादशी हो ॥ १२ ॥

उस शेष द्वादशी में भक्तियुक्त चित्त से पारण करे। द्वादशी में पारण न करने से पुण्य की हानि अवश्य हो जायगी ॥ १३ ॥

इसलिये सर्व प्रयत्न से द्वादशी मे पारण करना शुभदायक होता है। हे वत्स! व्रतियों को सम्पूर्ण व्रतफल की सिद्धि के लिये द्वादशी में पारण करना चाहिये ॥ १४ ॥

पारण के दिन बहुत से ब्राह्मणों को भोजन करावे, असमर्थ के लिये १२ ब्राह्मणों को भोजन कराना कहा है। पूजन सामग्री से पूजन कर तपस्वियों को भोजन करावे ।। १५ ।।

तृप्ति पर्यन्त शर्करायुक्त पायस का भोजन करावे और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराकर मौनपूर्वक वयं भोजन करे ॥ १६ ॥

परान्न, आमिष (हविष्यातिरिक्त वस्तु), मांस, माप (उरदी), तैल, स्त्री, मधु (सहद), औषध, मत्सर (दूसरे का अशुभ चिन्तन), हिंसा, कांस्य (कांसे के पात्र में भोजन), ताम्बूलभक्षण ॥ १७ ॥

वपन (चौर) और दो बार भोजन सर्वदा द्वादशी के दिन त्याग करे। यह व्रतों मे उत्तम व्रत तीन दिन से साध्य होता है ॥ १८ ॥

हे नृपश्रेष्ठ ! एकादशी के दिन भोजन नहीं करना चाहिये, और अन्न का तो सर्वथा त्याग करी देना चाहिये । यदि एकादशी के दिन अन्न का भक्षण करता है तो उसको नरक होता है ॥ १९ ॥

द्रव्य (पदार्थ), जल, लवण (नमक) जहाँ अग्नि में पकाये जाते है वहाँ उसी को अन्न कहा है। अन्य धान्य से सिद्ध जो अन्न है वह अन्न इसमें नहीं लिया है ॥ २० ॥

जो मोहवश एकादशी के दिन धान्य (चावल) का भोजन करता है, वह सौ चान्द्रायण व्रत करके पाप से मुक्त होता है ॥ २१ ॥

हे राजन् ! जो तुमने पूछा उसका उत्तर मैंने दिया । राजा' पुलिन्द बोले कि हे तात ! आपने परम अद्भुत जो रहस्य कहा है ॥ २२ ॥

उसके अनुष्ठान के लिये मैं अशक्त हूँ, क्योंकि मेरा शरीर जर्जर हो गया है। इस लिये आप कृपाकर इसके सार के सार को ठीक २ कहिये ॥ २३ ॥

हे भगवन् ! सार पदार्थ समस्त कर्मों के होते है। दत्तात्रेयजी बोले कि हे महाचाहो ! मैं परम अद्भुत रहस्य तुमसे कहता हूँ ॥ २४ ॥

जिसके अनुष्ठानमात्र से समस्त कार्य सफल होता है। हे राजन् ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का निर्जल व्रत करो ॥ २५ ॥

हे राजन् ! इसके अनुष्ठानमात्र से व्रत पूर्ण हो जाता है, इसमे संशय नहीं है। राजा पुलिन्द बोले हे दत्तात्रेयजी ! ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष की एकादशी निर्जला क्यों हुई १ ॥ २६ ॥

दत्ता-त्रेयजी बोले कि हे राजन् ! प्रथम राजा प्राचीनवहीं ने एकादशी के दिन सम्पूर्ण व्रत जलरहित किया, इस लिये एकादश । जलवर्जित हुई ॥ २७ ॥

निर्जला नाम से प्रसिद्ध एकादशी स्मरणमात्र से पापनाशिनी कही है। यह कहकर दत्तात्रेयजी चले गये। बाद राजा पुलिन्द ने भी इस व्रत को विधिपूर्वक किया ॥ २८ ॥

इस एकादशी व्रत के अनुष्ठानमात्र से पुण्यराशि के द्वारा राजा पुलिन्द दूसरे जन्म में प्रह्लाद नाम से प्रसिद्ध हिरण्यकशिपु का पुत्र हुआ ॥ २९ ॥

वेदव्यासजी वोले कि हे भीमसेन! यह प्राचीन इतिहास मैंने तुमसे कहा, जिसके श्रवण से तुम्हारा संशय दूर हो। हे भोम ! अब तुम क्या सुनना चाहते हो ॥ ३० ॥

भीमसेन बोले कि हे पितामह ! आपके प्रसाद से मोह नष्ट हुआ और स्मरण शक्ति मिली। हे तात ! व्रत करने के लिये मैं तैयार होकर बैठा हूँ, मैं आपके वचन का पालन करूंगा, इसमे संशय नहीं है ॥ ३१ ॥

स्कन्दजो ऋत्रियों से बोले कि हे ऋपिलोग ! वेदव्यासजी के कथ-नानुसार इस व्रत को भीमसेन ने भी किया, और चक्रपाणि विष्णु भगवान् के प्रसाद से समस्त पापों से मुक्त हो गये ॥ ३२ ॥

इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसाद-व्यासेन कृतायां भापाटीकायां एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

क्रमशः...
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ