"नीरव अनुराग"
पंकज शर्मा
किस नीरव वीणा के स्वर से
स्पंदित यह उर-तंत्री होती,
कौन अनागत सुधि बनकर
चुपके चुपके मन में रोती।
नभ के श्यामल रिक्त हृदय में
ज्योति-अंकुर कौन उगाता,
बिना कहे ही प्राण-कुंज में
मधु-गंधित आलोक बिछाता।
जब वाणी के थके पखेरू
लौट गगन की ओर चले जाते,
तब नयन-दीपों के संकेत
अनजाने संवाद रचाते।
स्नेह न होता शब्दों का वन,
न क्षणभंगुर स्वप्निल माया,
वह तो जैसे शीतल संध्या
थके दिवस के उर पर छाया।
किसी दूर के मौन तटों से
करुणा की सरिता बहती है,
अंतर से अंतर तक जाकर
अदृश्य पुलों को गढ़ती है।
जब जीवन के धूमिल पथ पर
स्मृतियाँ तम से भर जाती हैं,
तब स्नेहिल स्पर्शों की किरणें
मन-गुहा में दीप जलाती हैं।
ओ अनकहे मधुर संबंधों!
तुम ही तो प्राणों के स्वर हो,
तुमसे ही यह सूना अंतर
चिर-विरही वंशी का घर हो।
तुममें ही वह मौन छिपा है
जो आँसू को गीत बनाता,
जो मानव के क्षीण हृदय में
फिर से नव विश्वास जगाता।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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