बिखरे बिखरे से इशारे
अरुण दिव्यांशनभ मंडल के ये तारे ,
शशि संग जब हारे ।
जा रही निशा अब ये ,
भोर मुर्गा बाॅंग मारे ।।
छिपकर ईश निहारे ,
प्रभा छटा छिटक रहे ।
सिमट रहे शशि प्रभाव ,
खग शावक किलक रहे ।।
शशि निशा अब हारे ,
लेने लगे अब किनारे ।
छॅंट गया निशा बेला ,
खग बोले उषा आ रे ।।
शुक्ल मे निशा सुहानी ,
कृष्ण निशा भूत डेरा ।
मुर्गे का शोर सुनकर ,
भयभीत होता अंधेरा ।।
बिखरे बिखरे से इशारे ,
करते नभ के हर तारे ।
चल पड़ा अब प्रभाकर ,
घटे हैं अस्तित्व हमारे ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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