ज्येष्ठ मास महात्मय {चौबीसवां अध्याय}

आनन्द हठीला
स्कन्दजी ऋषियों से बोले और व्यास जी राजा युधिष्ठिर से बोले कि हे भारत ! तदनन्तर मद्रराज अश्वपति और नारद ऋषि का समागम हुआ। कथा के योग से राजसभा में नारद जी बैठे थे ॥ १ ॥
इसी समय राजकन्या सावित्री मन्त्रियो के साथ समस्त तीर्थ आश्रमो में जाकर पुनः अपने गृह को आई ॥ २ ॥
और नारद ऋषि के साथ पिता को स्थित देखकर सावित्री ने शिर से दोनों के चरणों का अभिवादन किया ॥ ३ ॥
नारदजी ने राजा से कहा कि हे नृप ! यह आपकी कन्या कहां गई थी? और कहां से आई है? और आप इस युवती को पति के लिये क्यों नहीं देते ? ॥ ४ ॥
राजा अश्वपति बोले कि हे देवर्षे ! नारद जी! इसी कार्य के लिये इसको भेजा था वही यह कार्य करके आई है। सो आप इसके उस कार्य को सुनिये, इसने जिसको पति वरा है ।। ५ ।।
जब पिता ने विस्तार से कहने के लिये कहा तव वह कन्या दव (भाग्य) वचन का अवलम्बन कर बोली ॥ ६ ॥
सावित्री बोली कि शान्व देश में धर्मात्मा द्युमत्सेन नामक क्षत्रिय राजा हुआ, वह राजा दैववश अन्धा हो गया ॥ ७ ॥
उस बालपुत्र से युक्त नेत्रहीन बुद्धिमान् उस राजा द्युमत्त्सेन के राज्य को छिद्र मिलने पर पूर्व के वैरी सामन्त (स्वदेश समीपवर्ती राजा ) ने हरण कर लिया ॥ ८ ॥
तब वह द्युमत्सेन अपने वालपुत्र और स्त्री के साथ वन को चला गया, और वह महाव्रती महारण्य में जाकर तप करने लगा ।। ९ ।।
उसका लड़का पुर (नगर) मे जन्मा था और तपोवन में जाकर बढा हैं तथा सत्यवान् नाम से विख्यात है उसको मैंने मन से वरा है ॥१० ॥
नारदजी बोले कि अहो ? महान् खेद हैं, इस सावित्री ने महान् पाप किया, इसने विना समझे गुणसम्पन्न सत्यवान् को पतिरूप में वर लिया है ॥ ११ ॥
इस बालक का पिता सत्य बोलता है और माता सत्य बोलती है इस लिये ब्राह्मणो ने इसका नाम सत्यवान् रखा है ॥१२॥
इस बालक को अश्व प्रिय है और मिट्टी का अश्व (घोड़ा) बनाता है तथा चित्र मे भी अश्व को लिखता है इस लिये इसका चित्राश्व भी नाम हैं ॥१३॥
राजा अश्वपति बोले कि हे नारदजी ! वह पितृवत्सल राजपुत्र सत्यवान् इस समय तेजस्वी, बुद्धिमान्, शूर है क्या ? ॥ १४ ॥
नारद जी बोले कि हे राजन् ! वह सूर्य के समान तेजस्वी, वृहस्पति के समान बुद्धिमान्, इन्द्र के समान शूर और पृथिवी के समान क्षमाशील है ॥ १५ ॥
तथा वह राजपुत्र दाता, ब्रह्मण्य, वीर्यवान्, रूपवान्, उदार और प्रिय दर्शन है ॥ १६ ॥
इस समय वह दान में अपनी शक्ति से राजा रन्तिदेव के समान, उशीनर पुत्र शिवि के समान ब्रह्मण्य और सत्यवादी है ॥ १७ ॥
वह बली द्युमत्सेन का पुत्र ययाति के समान उदार, चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन, रूप में अश्विनीकुमार के समान हैं ॥ १८ ॥
वह दान्त (तपःक्लेश का सहन शील), मृदु (सुकुमार), शूर, सिद्ध, जितेन्द्रिय और तप शील का निधि है ॥ १९ ॥
अश्वपति बोले कि हे नारदजी ! आप उस बालक को समस्त गुणों से युक्त कहते हैं। यदि उसमें कोई दोष हैं तो उनको भी मुझसे कहिये ॥ २० ॥
नारदजी बोले हे राजन् ! उस बालक में समस्त गुणों को दवाकर एक ही दोप है, और वह दोप प्रयत्न से यावत् शक्ति दूर करने मे अशक्य है ॥२१॥
एक ही दोष है, दूसरा कोई दोष नहीं है, सो वह चीणायु सत्यवान् आज से एक वर्ष बाद शरीर त्याग करेगा ॥ २२ ॥
राजा अश्वपति ने कहा कि हे सावित्रि ! हे शोभने ! इधर आओ, और दूसरे को वरने के निमित्त जाओ, उस सत्यवान् में समस्त गुणों को दवाकर एक महान् दोप है ॥ २३ ॥
जैसा कि देवसम्मत भगवान् नारदजी ने मुझसे कहा है कि यह अन्पायु बालक एक वर्ष में देहत्याग करेगा ॥ २४ ॥
सावित्री बोली कि हे पिताजी ! राजा लोग एक बार बोलते हैं और पण्डित लोग एक बार बोलते है, तथा कन्या एक बार दी जाती है, ये तीनों कार्य एक बार होते है ॥ २५ ॥
दीर्घायु अथवा अल्पायु हों, सगुण अथवा निर्गुण हों, मैंने एक बार पति को वर लिया अब दूसरा पति न वरूंगी ॥ २६ ॥
मन से कार्य निश्चित हो जाने पर बचन से कहा जाता है और बाद कर्म से किया जाता है, उसमे प्रमाणभूत मेरा मन है ॥ २७ ॥
हे तात ! इस मेरे मानस विचार का ध्यान रखकर जो कर्तव्य हो उसे आप कहिये। नारदजी बोले कि हे नरश्रेष्ठ ! सत्यवान् के विषय में सावित्री का विचार स्थिर है ॥ २८ ॥
जिसकी बुद्धि दूसरे पुरुप में निश्चय रूप से नहीं जाती है उसे किसी तरह इस धर्म मे पृथक् नहीं कर सकते ॥ २९ ॥
इस लिये आपकी कन्या का प्रदान ( विवाह सम्बन्ध) कर देना ही मुझे अच्छा मालूम होता है। राजा अश्वपति बोले कि हे नारदजी ! विना विचार किये मैंने वचन कहे है और आपके सत्य वचन को ॥ ३० ॥
मै करूंगा, क्योकि आप मेरे गुरु हैं। नारदजी बोले कि हे राजन् ! आपकी पुत्री सावित्री का प्रदान (विवाह सम्बन्ध) विघ्न रहिर हो ॥ ३१ ॥
यह कहकर नारदजी उठे और स्वर्ग लोक को चले गये। तदनन्तर राजा अश्वपति ने भी कन्या का वैवाहिक सत्र कार्य किया ॥ ३२ ॥
इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां चतुर्वि शोऽध्यायः ॥ २४ ॥
क्रमशः...
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