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ज्येष्ठ मास महात्मय {पच्चीसवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {पच्चीसवां अध्याय}

लेखक: आनन्द हठीला
स्कन्दजी बोले कि हे ऋषि लोग! नारदजी के चले जाने पर सब वृद्ध, द्विज, ऋत्विज, पुरोहित वर्ग को बुलाकर पुण्य तिथि में कन्या के साथ राजा द्युमत्सेन के आश्रम में जाने के निमित्त यात्रा किया ॥१॥

हे नृप ! राजा अश्वपति ने राजा द्युमत्सेन के मेधारण्य नामक आश्रम मे जाकर शाल वच्क्ष के सहारे स्थित महात्मा द्युमत्सेन को देखा ॥ २ ॥

कुशा के आसन पर स्थित, नेत्रहीन राजा को देखकर अश्वपति ने राजर्षि द्युमत्सेन का यथाविधि पूजन किया ॥ ३ ॥

और नियमित बचनो से स्वात्मा का निवेदन किया, और उनको कुशासन देकर वचन बोले ।। ४ ।।

उनका जो कुछ अभिप्राय और उस समय जो कुछ कर्तव्य था उसको समझकर ॥ ५ ।।

सत्यवान् के विषय में सभी बातें कह दीं। और बोले कि हे राजर्ये! मेरी शोभना सावित्री नाम की कन्या है ॥६॥

हे धर्मज्ञ ! आप उसको स्वधर्म से पतोहू के रूप में ग्रहण करें ॥ ७ ॥

राजा द्युमत्सेन बोले हे राजन् ! हम लोग राज्य से च्युत है और वनवास का आश्रय लेकर तपस्वियों का धर्म सेवन करते है। इस वनवास के आश्रम मे रहने के अयोग्य आपकी, कन्या इस शीत को किस तरह सहन करेगी ॥ ८ ॥

राजा अश्वपति बोले कि हे राजसत्तम ! इसने जानकर पति वरा है, हे मानद ! इस आपके पुत्र के साथ संवास (विवाह सम्बन्ध) ॥ ९ ॥

हे महाराज ! स्वर्ग के समान सुखदाई होगा, इसमें संशय नहीं है। हे राजन् ! मैं सुहृदभाव से आपके शरण तैयार होकर आया हूँ मेरी आशा को नष्ट न करें ॥ १० ॥

सभी तरह प्रेम के साथ मैं आया हूँ, आप मे वचून का त्याग न करें। अयोग्य भी आपका पुत्र मुझे अभिमत है और इसी तरह अयोग्य भी मेरी कन्या आपको अभिमत हो ॥ ११ ॥

आप मेरी कन्या को पुत्रवधू बनाने के निमित्त और आपका पुत्र उसे अपनी भार्या बनाने के निमित्त ग्रहण करें ॥ १२ ॥

राजा द्युमत्सेन बोले कि हे राजन् ! मेरा आपके साथ संबन्ध करने का विचार पूर्व से ही था, परन्तु इस समय मैं राज्यहीन हूँ इस लिये मैंने अपना निश्चय आपसे कहा ।। १३ ।।

उसके बाद दोनों राजाओं ने सभी आश्रमवासी द्विजों को एकत्रित कर विधिपूर्वक विवाह संस्कार किया ॥ १४ ॥

राजा अश्वपति वर के योग्य कन्या का मय सामग्री के दान कर परम हर्ष के साथ अपने घर को गये ।। १५ ।।

सत्यवान् भी सर्वगुण सम्पन्ना उस भार्या को पाकर प्रसन्न हुआ तथा वह सावित्री इच्छित भर्ता को पाकर प्रसन्न हुई ॥ १६ ॥

और पिता के चले जाने पर सम्पूर्ण आभूषणों को उतार कर वन्कल के आभूषण और कापाय वस्त्र को धारण किया ॥१७॥

सावित्री ने अपने सेवागुण प्रश्रय (नम्रता), दम, समस्त गृह कार्य कर्मों से सेवाकर सवों को प्रसन्न किया ॥ १८ ॥

इसी तरह उस आश्रम मे सदा निवास करने वाले सत् पुरुपों को प्रसन्न किया। और राजर्षि सत्यवान् भो उस पत्नी से प्रसन्न हुआ ॥ १९ ॥

तथा उस वन के एक भाग में इन्द्राणी के साथ इन्द्र के समान वह आनन्द करता था। हे ब्राह्मण लोग ! इस तरह कुछ समय बीत गया ॥ २० ॥

परन्तु सावित्री के मन मे शयन, गमन आदि सभी समय में दिनरात नारद की बात बनी रहती थी ॥ २१ ॥

इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाट्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां पञ्चविंशोऽध्यायः ।। २५ ।।


क्रमशः...
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