मित्रता, स्वार्थ और छल का युग - एक कड़वा आत्ममंथन
- डॉ. राकेश दत्त मिश्र
मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है और उसके जीवन में संबंधों का विशेष महत्व होता है। इन संबंधों में यदि कोई सबसे पवित्र और आत्मीय बंधन माना गया है, तो वह है मित्रता। मित्रता केवल साथ चलने का नाम नहीं, बल्कि वह विश्वास है, वह भावना है, जो बिना किसी स्वार्थ के दो व्यक्तियों को जोड़ती है। परंतु आज के बदलते समय में यही मित्रता अपने मूल स्वरूप से भटकती हुई दिखाई दे रही है।
मैंने अपने जीवन में मित्रता को सदैव एक साधना के रूप में अपनाया। जो भी मेरे जीवन में आया, उसे मैंने पूरे मन से स्वीकार किया, उस पर विश्वास किया, उसके साथ खड़ा रहा। मैंने कभी यह नहीं सोचा कि वह व्यक्ति मुझे क्या देगा, बल्कि यह सोचा कि मैं उसके लिए क्या कर सकता हूँ। परंतु धीरे-धीरे अनुभवों ने यह सिखाया कि आज के समय में अधिकतर लोग मित्रता को भावना नहीं, बल्कि सुविधा और स्वार्थ का माध्यम मानते हैं।
समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि जो लोग मेरे साथ जुड़े, उनमें से अधिकांश का उद्देश्य केवल अपना लाभ था। जब तक उन्हें मेरी आवश्यकता थी, वे मेरे साथ रहे—मेरे निकट रहे, मेरे विचारों से सहमत रहे, मेरे प्रयासों की सराहना करते रहे। परंतु जैसे ही उनका स्वार्थ पूर्ण हुआ, वे धीरे-धीरे दूर होते गए। यह दूरी केवल शारीरिक नहीं थी, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी थी। यह अनुभव केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि आज के समाज की एक व्यापक सच्चाई बन चुका है।
आज के युग में मित्रता का स्वरूप बदल चुका है। यह अब त्याग और समर्पण पर नहीं, बल्कि लाभ और अवसर पर आधारित होती जा रही है। लोग संबंधों को निभाने के लिए नहीं, बल्कि उपयोग करने के लिए जोड़ते हैं। सामने से मधुर व्यवहार और पीछे से स्वार्थ की गणना—यह दोहरा चरित्र आज सामान्य हो गया है।
यदि हम सामाजिक और राजनीतिक जीवन की ओर देखें, तो यह प्रवृत्ति और भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। राजनीति, जिसे सेवा का माध्यम माना जाता है, आज अधिकांशतः समीकरण और स्वार्थ का खेल बन गई है। यहाँ मित्रता स्थायी नहीं होती, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। जब तक आप उपयोगी हैं, तब तक आप “अपने” हैं, और जैसे ही आपकी उपयोगिता समाप्त होती है, आप भी उस सूची से बाहर कर दिए जाते हैं।
मैंने स्वयं इस क्षेत्र में यह अनुभव किया है कि लोग आपके साथ खड़े होते हैं, आपके मंच साझा करते हैं, आपके नाम का उपयोग करते हैं, परंतु जैसे ही उन्हें कोई दूसरा विकल्प या अधिक लाभ दिखाई देता है, वे बिना किसी संकोच के अपना मार्ग बदल लेते हैं। यहाँ निष्ठा नहीं, बल्कि अवसरवादिता प्रमुख होती है। यह स्थिति केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में दिखाई देती है—चाहे वह सामाजिक संगठन हों, धार्मिक मंच हों या व्यक्तिगत संबंध।
कभी-कभी मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में मैं मित्रता निभा रहा था, या अनजाने में किसी के स्वार्थ की पूर्ति का साधन बन रहा था? जो लोग मेरे साथ थे, क्या वे वास्तव में मेरे अपने थे, या केवल उस समय के लिए साथ थे जब तक उन्हें मेरी आवश्यकता थी? यह प्रश्न केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि आज के समय के हर उस व्यक्ति का है, जिसने सच्चाई और निष्ठा के साथ संबंधों को निभाने का प्रयास किया है।
हमारी संस्कृति में मित्रता का आदर्श भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा के संबंध में देखा जाता है-जहाँ निस्वार्थता, समर्पण और सच्चाई का सर्वोच्च उदाहरण मिलता है। परंतु आज के समय में लोग उस आदर्श को अपनाने के बजाय, केवल उसका उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करना चाहते हैं। धर्म, जो हमें सत्य और निष्ठा का मार्ग दिखाता है, आज कई बार केवल एक आडंबर बनकर रह गया है।
इन सभी अनुभवों के बीच एक समय ऐसा भी आता है जब व्यक्ति स्वयं से प्रश्न करता है-क्या गलती मेरी थी? क्या मैंने लोगों पर अधिक विश्वास किया? क्या मैंने बिना परख के सबको अपना मान लिया? परंतु अंततः यह समझ में आता है कि सच्चाई और निस्वार्थता कभी गलती नहीं हो सकती। गलती उन लोगों की होती है, जो इन भावनाओं का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करते हैं।
इन अनुभवों ने मुझे यह सिखाया है कि हर मुस्कुराता चेहरा मित्र नहीं होता, हर साथ चलने वाला व्यक्ति आपका अपना नहीं होता, और हर “भाई” कहने वाला वास्तव में आपका हितैषी नहीं होता। आज मित्रता एक भावना नहीं, बल्कि परख और समझ का विषय बन चुकी है।
फिर भी, इन सबके बावजूद, मैं यह मानता हूँ कि सच्ची मित्रता का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ है। आज भी ऐसे लोग हैं, जो निस्वार्थ भाव से संबंध निभाते हैं, जो कठिन समय में साथ खड़े रहते हैं, जो बिना किसी अपेक्षा के आपका हाथ थामते हैं। ऐसे लोग कम हैं, परंतु वही इस संसार की सच्ची शक्ति हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने संबंधों को आँख मूँदकर नहीं, बल्कि विवेक के साथ चुनें। मित्रता करें, परंतु आत्मसम्मान के साथ। विश्वास करें, परंतु समझदारी के साथ। सहयोग करें, परंतु अपनी सीमाओं को पहचानते हुए।
अंततः, जीवन हमें यही सिखाता है कि स्वार्थ और छल के इस युग में भी सच्चाई का मार्ग ही सबसे मजबूत है। हो सकता है कि सच्चे लोग कई बार अकेले पड़ जाएँ, उनका उपयोग किया जाए, उन्हें मूर्ख समझा जाए—परंतु उनकी सच्चाई ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति होती है।
आज के समय में यदि आप सच्चे हैं, तो आपको कमजोर समझा जाएगा। यदि आप निस्वार्थ हैं, तो आपका उपयोग किया जाएगा। और यदि आप स्पष्टवादी हैं, तो आपसे दूरी बना ली जाएगी। परंतु इसके बावजूद, सच्चाई को छोड़ना कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि अंततः जीत उसी की होती है, जो अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है।
मित्रता कोई सौदा नहीं, बल्कि आत्मा का संबंध है-और जो इस सत्य को समझता है, वही सच्चा मित्र कहलाने के योग्य है। बाकी सब केवल समय और स्वार्थ के यात्री हैं, जो आते हैं, अपना काम निकालते हैं और चले जाते हैं।
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