तारीखें हैं रोज बदलती
वे क्षण लौट नहीं आते।।
परछाईं सी यादें चलतीं
साथ मगर नि:शब्द अबूझ।
शून्य दिशाएँ हाँक लगातीं
किन्तु पधिक के लिए असूझ।
बुझती लौ के दीपक आहत
साहस नहीं जुटा पाते।।
चाँद कभी था लगा टहाका
फूल सदृश थे तारागण।
रजनी का प्यारा सा आँचल
और चित्र का मधुर स्मरण।
सत्य अकिंचन सा लगता है
साँसों के आते जाते।।
खाली- खाली सा घर लगता
एकाकीपन भार लगे ।
वातायन पर गौरैया का
ताजा नन्हा प्यार लगे ।
पादप की टहनी का स्वर
लगता उदास गाते गाते।।
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