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आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महाकुंभ: चातुर्मास

आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महाकुंभ: चातुर्मास

सत्येन्द्र कुमार पाठक
काल-चेतना और चातुर्मास का वैश्विक दर्शन में सृष्टि की अनंत यात्रा में 'समय' (काल) को भारतीय मनीषा ने केवल भौतिक इकाई नहीं, बल्कि चेतना के उत्थान का सोपान माना है। अथर्ववेद के 'काल सूक्त' के अनुसार, काल ही सबको उत्पन्न करता है और काल ही सबको परिपक्व करता है। इसी काल-चक्र का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक खंड है—'चातुर्मास'। आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवप्रबोधनी) तक की यह चार मास की अवधि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संचरण, प्रकृति के पुनर्जीवन और मानवीय अंतःकरण के शुद्धिकरण का महापर्व है। चातुर्मास की अवधारणा भौगोलिक सीमाओं को लांघकर विश्व की हर प्राचीन संस्कृति में 'संयम' और 'एकांतवास' के रूप में विद्यमान है।
भगवान विष्णु की योग निद्रा और भगवान शिव का शासन में भारतीय वास्तुकला और दर्शन में चातुर्मास का आधार खगोलीय और पौराणिक दोनों है। विष्णु पुराण एवं श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान विष्णु और राजा बलि का संवाद चातुर्मास का आधार स्तंभ है। जब वामन रूप में भगवान ने तीन पग में त्रिलोक नाप लिया, तब बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर उन्होंने पाताल लोक में बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार किया। स्कंद पुराण (कार्तिक मास महात्म्य) के अनुसार, इन चार महीनों में भगवान विष्णु 'योगनिद्रा' में होते हैं। यह निद्रा सुप्तावस्था नहीं, बल्कि सृष्टि की ऊर्जा का अंतर्मुखी होना है। चातुर्मास प्रदा भगवान शिव: जब पालनकर्ता विष्णु शयन करते हैं, तब सृष्टि के संहारक और पुनरुद्धारक भगवान शिव इस धरा का भार संभालते हैं। शिव पुराण के अनुसार, श्रावण मास में शिव का अधिपति होना यह दर्शाता है कि वर्षा ऋतु में जब बाहरी जगत अशांत (तूफान/वर्षा) होता है, तब शिव (कल्याण) की शरण ही एकमात्र मार्ग है।
दक्षिणायन का प्रभाव में विभिन्न ज्योतिष ग्रंथों, जैसे वराहमिहिर की 'बृहत्संहिता', में चातुर्मास को 'दक्षिणायन' का संधिकाल माना गया है। चातुर्मास समय सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है। देवताओं की रात्रि प्रारंभ होती है और नकारात्मक ऊर्जाएं प्रभावी हो सकती हैं। इसे संतुलित करने के लिए 'मंत्र-जप' और 'तप' का विधान बनाया गया है।
चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के अनुसार, वर्षा ऋतु में 'जठराग्नि' मंद हो जाती है और वात-पित्त का असंतुलन बढ़ता है। इसीलिए स्मृति ग्रंथों ने इस दौरान विशिष्ट खाद्य पदार्थों के त्याग का नियम बनाया:
श्रावण: पत्तेदार सब्जियां (वात वृद्धि रोकने हेतु)। भाद्रपद: दही (कफ और संक्रमण से बचाव हेतु)। आश्विन: दूध (पित्त शमन हेतु)। कार्तिक: द्विदलन यानी दालें है।
मासवार दैवीय समर्पण एवं संप्रदाय संस्कृति - चातुर्मास का प्रत्येक मास एक विशिष्ट ऊर्जा और अधिपति देवता को समर्पित है, जो विभिन्न संप्रदायों (शैव, वैष्णव, शाक्त) को जोड़ता है। श्रावण भगवान शिव समर्पण और भक्ति (अभिषेक)। भाद्रपद धर्मराज, यमराज व गणपति न्याय, अनुशासन और बुद्धि का संतुलन।आश्विन पितृ, शक्ति व अश्विनी कुमार पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और शक्ति की उपासना। कार्तिक कार्तिकेय व माता लक्ष्मी शौर्य, विजय और ऐश्वर्य का प्रकाश है । चातुर्मास की अवधारणा जैन और बौद्ध धर्मों में अत्यंत कठोर और वैज्ञानिक रूप में मिलती है। जैन धर्म (कल्पसूत्र संदर्भ): जैन आगमों के अनुसार, वर्षा ऋतु में 'त्रस जीवों' (चलने वाले सूक्ष्म जीव) की उत्पत्ति बढ़ जाती है। भगवान महावीर ने 'अहिंसा' की रक्षा हेतु 'वर्षावास' का नियम बनाया। 'दशवैकालिक सूत्र' में मुनियों के लिए एक स्थान पर रुकने (स्थिर वास) को अनिवार्य बताया गया है ताकि पैरों तले जीवों की हिंसा न हो। बौद्ध धर्म (विनय पिटक संदर्भ): बौद्ध ग्रंथों में इसे 'वस्सा' (Vassa) कहा गया है। बुद्ध ने 'महावग्ग' में भिक्षुओं को आदेश दिया कि वे तीन महीने तक विहार (भ्रमण) न करें। थाईलैंड और म्यांमार में आज भी इसे 'बुद्धिस्ट लेंट' के रूप में मनाया जाता है।
: सात समुद्र पार चातुर्मास की पौराणिक कथाएं - अब्राहमिक धर्म (ईसाई, इस्लाम, यहूदी):यद्यपि 'चातुर्मास' शब्द भारतीय है, किंतु इसकी आत्मा इन धर्मों में भी है:। ईसाई धर्म (बाइबल): मत्ती (4:2) में ईसा मसीह के 40 दिनों के उपवास और प्रार्थना (Lent) का उल्लेख है। यह चातुर्मास के 'संयम' और 'प्रायश्चित' काल के पूर्णतः समान है। इस्लाम (कुरान): कुरान में चार पवित्र महीनों (अशहुरुल हुरुम) का उल्लेख है जिनमें युद्ध और हिंसा वर्जित है। रमजान का महीना भी आत्म-शुद्धि का काल है। यहूदी धर्म: 'योम किप्पुर' से पूर्व के दिनों में उपवास और प्रायश्चित की परंपरा चातुर्मास के आध्यात्मिक चिंतन को दर्शाती है ।
रूस और स्लाविक देश: प्राचीन स्लाविक पौराणिक कथाओं में 'पेरुन' (आकाश और बिजली के देवता) की कथा है। मान्यता है कि वर्षा काल में प्रकृति 'गर्भवती' होती है, इसलिए धरती को खोदना या युद्ध करना पाप माना जाता था।
चीन: चीनी बौद्ध परंपरा में 'मंकी किंग' (सुन वुकोंग) की साधना कथाएं वर्षा ऋतु के एकांतवास से जुड़ी हैं। यहाँ 'कमल' (पवित्रता) को चातुर्मास का प्रतीक माना जाता है। अमेरिका और इंग्लैंड: इंग्लैंड में 'सेंट स्वीडन दिवस' (15 जुलाई) की पौराणिक मान्यता है कि यदि उस दिन वर्षा हुई, तो 40 दिनों तक वर्षा होगी। यह भारतीय 'आषाढ़' मास के समय से मेल खाता है। अमेरिका के मूल निवासियों (Hopi Indians) में वर्षा ऋतु में 'कचिना' देवताओं के पृथ्वी पर उतरने की कथाएं प्रचलित हैं।
ऐतिहासिक यात्रा: सतयुग से आधुनिक काल (मुगल-ब्रिटिश काल) तक - चातुर्मास का स्वरूप युगों के साथ विकसित हुआ: है। सतयुग एवं त्रेता: यह 'ऋषियों' और 'तपस्वियों' का काल था। वेदों की संहिताओं का गहन अध्ययन इन्हीं चार महीनों में एकाग्रता से होता था।द्वापर: भगवान कृष्ण ने चातुर्मास को 'गोवर्धन पूजा' और 'शरद पूर्णिमा' (रास) के माध्यम से उत्सव और प्रकृति प्रेम से जोड़ा। मुगल एवं ब्रिटिश काल: भारत के कठिन समय में चातुर्मास ही वह सूत्र था जिसने बिखरती संस्कृति को संजोया। संतों और संन्यासियों ने गाँवों में रुककर कथा-प्रवचन के माध्यम से जनमानस में धर्म और स्वाभिमान की ज्योति जलाए रखी। आधुनिक काल: आज चातुर्मास 'इकोलॉजिकल हीलिंग' (पर्यावरण पुनरुद्धार) और 'मेंटल वेलनेस' (मानसिक शांति) का वैश्विक मॉडल बन गया ।
गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु अर्जुन देव जी द्वारा रचित 'बारहमासा' (राग माझ) में प्रत्येक मास की आध्यात्मिक व्याख्या है। सावन और भादो के महीनों को गुरु की सेवा और प्रभु-सिमरन के लिए अत्यंत अनुकूल बताया गया है। इसमें कहा गया है कि जैसे वर्षा से धरती हरी-भरी होती है, वैसे ही नाम-सिमरन से आत्मा पल्लवित होती है । विविध संप्रदायों का समन्वय चातुर्मास भारत की सामाजिक समरसता का प्रतीक है। इसमें शैव, वैष्णव, शाक्त, बौद्ध और जैन सभी अपने-अपने तरीके से एक ही उद्देश्य—'आत्म-शुद्धि'—के लिए प्रयास करते हैं। यह समय कला (रासलीला), संगीत (सावन के गीत/कजरी) और लोक-संस्कृति के संवर्धन का रूप है।
भविष्य के लिए चातुर्मास का संदेश में चातुर्मास केवल प्राचीन परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकताओं का उत्तर है। यह हमें सिखाता है कि: संयम: संसाधनों का सीमित उपयोग।अहिंसा: प्रकृति और सूक्ष्म जीवों के प्रति संवेदनशीलता। स्वास्थ्य: ऋतुचर्या के अनुसार जीवनशैली। यह प्रमाणित करता है कि विश्व की सभी संस्कृतियों का मूल चिंतन एक ही है। भगवान शिव, जो 'चातुर्मास प्रदा' हैं, वे हमें संदेश देते हैं कि जब बाहर का वातावरण चुनौतीपूर्ण हो, तब अपने भीतर की शक्ति (आत्मा) में शरण लेना ही वास्तविक समाधान है।संदर्भ - ऋग्वेद संहिता: ऋतु सूक्त एवं काल सूक्त (अथर्ववेद)।श्रीमद्भागवत पुराण: वामन अवतार एवं बलि प्रसंग (दशम स्कंध)।विनय पिटक (बौद्ध ग्रंथ): महावग्ग - वर्षावास नियम। जैन आगम: कल्पसूत्र (भद्रबाहु स्वामी) एवं दशवैकालिक सूत्र। बृहत्संहिता: वराहमिहिर (खगोलीय एवं ज्योतिषीय गणना)। चरक संहिता: सूत्रस्थान - ऋतुचर्या वर्णन। गुरु ग्रंथ साहिब: बारहमासा (राग माझ)। तुलनात्मक धर्मशास्त्र: बाइबल (मत्ती 4:2) एवं कुरान (सूरा अल-बकराह)। वैश्विक लोककथाएं: Slavic Mythology (Perun) एवं Native American Folklore (Hopi Traditions
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