आखिरी मोहब्बत
अरुण दिव्यांशप्यार आखिरी मोहब्बत होता ही है ,
ऐसा ही बीज आशिक बोता ही है ।
हो जाते हैं शेष सारे लोग ही पीछे ,
अपने जनों को प्यार खोता ही है ।।
खोनेवाला प्यार ही वह तो होता है ,
जो प्यार लैला मजनूॅं सा होता है ।
शेष सारे तो होते ही हैं वे पावन ,
हॅंसी खुशी में सबको डूबोता है ।।
दुःख में संग में पलकें भींगोता है ,
डूबनेवालों को भी जो बचाता है ।
गिरते हुए को भी जो उठाता है ,
वही प्यार तो जनों को भाता है ।।
वह भी होता प्यार का आशिक ,
कलेजे का टुकड़ा बन जाता है ।
वही विशेष धोखा भी है करता ,
ज़हरीले सर्प सा डॅंस जाता है ।।
संविधान दे जाता उसको छूट ,
पर छुट जाते हैं घर रिश्ते नाते ।
पति पत्नी का रिश्ता अल्पावधि ,
दीर्घकालिक रिश्ते बन न पाते ।।
होता है वह एक श्वेत सा प्यार ,
सच्ची निष्ठा निज ही अपनाता है ।
वही पर को भी अपना है बनाता ,
हर ऑंखों का तारा बन जाता है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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