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मिट्टी की परतों में दफन 'अदृश्य स्वर्णयुग'

मिट्टी की परतों में दफन 'अदृश्य स्वर्णयुग'

सत्येन्द्र कुमार पाठक
बिहार की धरती, विशेषकर मध्य बिहार का मगध अंचल और उत्तर बिहार का मिथिला क्षेत्र, ऊँचे-ऊँचे मिट्टी के टीलों से पटा पड़ा है। ग्रामीण शब्दावली में इन्हें 'डीह' कहा जाता है। पुरातत्व की दृष्टि से ये 'डीह' (Mounds) वे स्थान हैं जहाँ कभी मानव बस्तियाँ, बौद्ध विहार, मंदिर या प्रशासनिक केंद्र स्थित थे। समय के चक्र ने इन्हें मिट्टी के नीचे दबा दिया, लेकिन इनकी ऊँचाई आज भी इनके भीतर दबे 'गढ़' (किले) और महलों की गवाही देती है। यह आलेख बिहार के इन्हीं विस्मृत केंद्रों—शहर तेलपा, करपी, परियारी, धराउत, और घेजन—जैसे स्थलों के माध्यम से भारत के उस 'अदृश्य स्वर्णयुग' को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास है। 'डीह' और 'गढ़': व्युत्पत्ति एवं दार्शनिक संबंध में 'डीह' शब्द संस्कृत के 'देह' या 'देश' के अपभ्रंश के रूप में देखा जा सकता है, जो किसी विशिष्ट स्थान या 'आदि-बस्ती' का सूचक है।
पुरातात्विक पक्ष: 'डीह' वह आधार है जिस पर सभ्यता की परतें (Layers) चढ़ती गईं।ऐतिहासिक पक्ष: 'गढ़' उस कालखंड को दर्शाता है जब समाज संगठित हुआ और सुरक्षा के लिए प्राचीर (Fortification) बनाई गई।
सांस्कृतिक पक्ष: जब ये भौतिक गढ़ ढह गए, तो लोक-परंपरा ने इन्हें 'डिहवार बाबा' के रूप में आत्मसात कर लिया। आज बिहार के हर गाँव के बाहर एक 'डीह' है, जहाँ ग्राम देवता का वास माना जाता है। यह वास्तव में अपने पूर्वजों और उनके गौरवशाली इतिहास को याद रखने का एक 'अचेतन' (Subconscious) तरीका है।
वैदिक नदी हिरण्यबाहू , सोन-पुनपुन-फल्गु घाटी: सभ्यताओं का उद्गम स्थल
बिहार के अरवल और जहानाबाद जिले इन टीलों के सबसे धनी क्षेत्र हैं। इसका मुख्य कारण यहाँ की नदियाँ—सोन (वैदिक हिरण्यबाहु), पुनपुन (पुना-पुना), और फल्गु (निरंजना) हैं। वैदिक नदी हिरण्यबाहू विलुप्त नदी के तट पर स्थित करपी का डीह पुरातात्विक अन्वेषण का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। यहाँ की खुदाई में मौर्यकालीन 'उत्तरी काले चमकीले मृदभांड' मिले हैं। ये मृदभांड उस समय की 'उच्च-तकनीक' के प्रतीक थे। यह डीह सिद्ध करता है कि सोन नदी प्राचीन काल में पाटलिपुत्र को पश्चिम और दक्षिण भारत से जोड़ने वाला मुख्य जलमार्ग थी। यहाँ का 'गढ़' संभवतः एक सीमा-शुल्क केंद्र या व्यापारिक छावनी रहा होगा।
धराउत (धरावत): ज्ञान का विस्मृत महाकुंभ जहानाबाद का धराउत डीह उस 'अदृश्य स्वर्णयुग' का सबसे बड़ा प्रमाण है। चीनी यात्रियों का विवरण: ह्वेनसांग ने जिस 'गुणमती विहार' का वर्णन किया, वह धराउत के इसी विशाल टीले के नीचे दबा है। : यहाँ की गुप्तकालीन ईंटें (आकार में वर्तमान ईंटों से लगभग दुगुनी) और खंडित पाषाण स्तंभ यह बताते हैं कि यह स्थान नालंदा के समकक्ष एक महान विश्वविद्यालय था। यहाँ का 'चंद्रपोखर' और उसके किनारे बिखरी मूर्तियाँ पालकालीन वैभव की अंतिम स्मृतियाँ हैं।
घेजन डीह: वज्रयान और कला का चरमोत्कर्ष जहानाबाद का घेजन गाँव ऐतिहासिक रूप से पाल राजाओं के संरक्षण में विकसित हुआ। यहाँ के टीले से प्राप्त बुद्ध और तारा की प्रतिमाएँ 'काला कसौटी पत्थर' (Black Basalt) पर उकेरी गई हैं। घेजन यह दर्शाता है कि कैसे 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच मगध बौद्ध धर्म के 'वज्रयान' संप्रदाय का वैश्विक केंद्र बन गया था। यहाँ की मूर्तियाँ आज भी स्थानीय लोगों द्वारा 'डीह की देवी' के रूप में पूजी जाती हैं।
युगों का स्तरीकरण: सतयुग से ब्रिटिश काल तक बिहार के इन डीहों की खुदाई इतिहास की एक 'टाइमलाइन' प्रस्तुत करती है: प्राचीनतम काल (वैदिक/पौराणिक): टीलों के सबसे निचले स्तर पर सूक्ष्म पाषाण उपकरण और कच्ची मिट्टी के साक्ष्य मिलते हैं, जो ऋषियों के आश्रमों और आदि-बस्तियों (जैसे बक्सर का अहिरौली) की याद दिलाते हैं। मौर्य एवं शुंग काल: यहाँ से पकी ईंटों की किलेबंदी और आहत सिक्के (Punch Marked Coins) प्राप्त होते हैं। बलिराजगढ़ (मधुबनी) इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। गुप्त काल (स्वर्णयुग): मंदिरों का निर्माण और उच्च कोटि की नक्काशी। करपी और परियारी के डीहों पर गुप्तकालीन ईंटों का पाया जाना इस क्षेत्र की प्रशासनिक मजबूती को दर्शाता है। पाल काल: यह काल 'गढ़ों' के पुनरुद्धार का था। धराउत और घेजन जैसे स्थानों पर बौद्ध विहारों को सुरक्षात्मक प्राचीरों से घेरा गया।
मध्यकाल एवं मुगल काल: कई प्राचीन डीहों पर सराय, मजारें या छोटी चौकियाँ बनाई गईं। स्थानीय जमींदारों ने पुराने 'गढ़ों' को अपना केंद्र बनाया। ब्रिटिश एवं आधुनिक काल: कनिंघम और बेगलर जैसे पुरातत्वविदों ने इन टीलों की पहचान की। आज ये स्थल पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग (ASI) और लोक-आस्था के बीच झूल रहे हैं।
. करपी और परियारी: दोआब की सामरिक विरासत अरवल जिले के करपी और परियारी डीह मगध के आंतरिक रक्षा तंत्र के महत्वपूर्ण हिस्से थे। सामरिक स्थिति: सोन और पुनपुन के बीच का वैदिक नदी हिरण्यबाहु विलुप्त नदी क्षेत्र अत्यंत उपजाऊ और सामरिक रूप से संवेदनशील था। करपी का ऊँचा 'गढ़' आज भी एक दुर्ग की भांति खड़ा है। यहाँ के 'डिहवार बाबा एवं जगदंबा स्थान मंदिर में स्थित जगदंबा , चतुर्भुज भगवान , शिवपार्वती बिहार , शिवलिंग , अनेक विभिन्न देवों देवियों ' की पूजा यह संकेत देती है कि यहाँ कभी कोई वीर योद्धा या शासक था जिसने आक्रमणकारियों से इस क्षेत्र की रक्षा की थी।
लोक-संस्कृति में 'डीह' का स्थान: संरक्षण का अनूठा मॉडल।इतिहास की किताबों से इतर, 'डीह' बिहार की लोक-संस्कृति में जीवित हैं। : विवाह, मुंडन या फसल कटाई (नवान) के समय सबसे पहला निमंत्रण 'डीह' को दिया जाता है। अदृश्य रक्षक: मान्यता है कि 'डिहवार बाबा' अदृश्य रूप में लाठी लेकर रात में गाँव की सीमाओं की रक्षा करते हैं।। यह लोक-आस्था ही है जिसने इन टीलों को आज तक बचाए रखा है। ग्रामीण इन टीलों से ईंट हटाना या पत्थर ले जाना 'अशुभ' मानते हैं, जिससे अनजाने में ही सही, पुरातात्विक साक्ष्य सुरक्षित बचे हुए हैं।
अदृश्य स्वर्णयुग' के पुनरुद्धार की चुनौतियाँ आज ये ऐतिहासिक धरोहरें कई खतरों का सामना कर रही हैं: अतिक्रमण: जनसंख्या बढ़ने के साथ कई छोटे 'डीह' काटकर खेत बना दिए गए हैं।: खुदाई के दौरान मिलने वाली बहुमूल्य मूर्तियों और ईंटों को लोग बिना ऐतिहासिक समझ के कहीं भी रख देते हैं। पटना और नालंदा के बाहर के इन महत्वपूर्ण स्थलों ( करपी , घेजन , धराउत , बराबर पर्वत समूह , ब्रह्मयोनि पर्वत समूह , कैमूर पर्वत समूह , राजगीर पर्वतसमूह प बिखरे विरासत मूर्तियां ) को वह अंतरराष्ट्रीय पहचान नहीं मिल पाई है, जिसके ये हकदार हैं।. भविष्य के लिए ऐतिहासिक आह्वान बिहार के 'डीह' और 'गढ़' मिट्टी के ढेर नहीं, बल्कि उस महागाथा के अक्षर हैं जिसे अभी पूरा पढ़ा जाना बाकी है ।
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