मतलबी है लोग यहाँ पर, मतलबी जमाना…
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
“मतलबी है लोग यहाँ पर, मतलबी जमाना,
सोचा साया साथ देगा, निकला वो बेगाना…”
यह पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि आज के समाज की नंगी सच्चाई हैं। यह वह पीड़ा है, जो हर उस व्यक्ति के मन में कहीं न कहीं घर कर जाती है, जिसने जीवन में कभी विश्वास किया हो, अपनापन दिया हो और बदले में उपेक्षा, छल या स्वार्थ का सामना किया हो। आज जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो एक अजीब सी विडंबना सामने आती है—लोगों की भीड़ है, संबंधों का जाल है, लेकिन सच्चे अपनत्व का अभाव है। हर चेहरा मुस्कुराता हुआ प्रतीत होता है, परन्तु उस मुस्कान के पीछे छिपा स्वार्थ कब सामने आ जाए, इसका कोई भरोसा नहीं।
मानव जीवन का आधार ही संबंधों पर टिका है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह अकेले नहीं जी सकता। उसे सहारा चाहिए, साथ चाहिए, अपनापन चाहिए। यही कारण है कि वह रिश्ते बनाता है—परिवार के, मित्रों के, समाज के। लेकिन आज का यह कटु सत्य है कि इन रिश्तों की नींव अब भावनाओं पर नहीं, बल्कि स्वार्थ पर टिकती जा रही है। जब तक आप किसी के काम के हैं, तब तक आप उसके अपने हैं। जैसे ही आपकी उपयोगिता समाप्त होती है, वैसे ही आपका महत्व भी समाप्त हो जाता है।
यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है। यह आधुनिकता, भौतिकवाद और अंधी प्रतिस्पर्धा का परिणाम है। आज हर व्यक्ति अपनी सफलता की दौड़ में इतना व्यस्त है कि उसे दूसरों के भावनात्मक पक्ष को समझने का समय ही नहीं है। वह हर संबंध को लाभ और हानि के तराजू में तौलता है। यदि किसी से उसे फायदा है, तो वह उसके साथ मधुर व्यवहार करता है; यदि नहीं, तो वह उसे अनदेखा कर देता है। यही कारण है कि आज रिश्तों में स्थायित्व नहीं रहा, विश्वास नहीं रहा, और सबसे महत्वपूर्ण—निस्वार्थ प्रेम नहीं रहा।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब वह व्यक्ति भी बदल जाता है, जिसे हमने अपना सबसे करीबी माना हो। हम सोचते हैं कि “साया”—जो हर परिस्थिति में हमारे साथ रहेगा—वह कभी हमें नहीं छोड़ेगा। परन्तु जब वही साया भी बेगाना हो जाता है, तब मन टूट जाता है। यह केवल एक संबंध का टूटना नहीं होता, बल्कि यह विश्वास का टूटना होता है। और जब विश्वास टूटता है, तो व्यक्ति भीतर से खाली हो जाता है।
इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है—अत्यधिक अपेक्षाएँ। हम दूसरों से वही अपेक्षा रखते हैं, जो हम उनके लिए करते हैं। लेकिन हर व्यक्ति एक जैसा नहीं होता। किसी के लिए संबंध प्राथमिकता होते हैं, तो किसी के लिए केवल साधन। इसके अतिरिक्त, स्वार्थ का टकराव भी एक बड़ा कारण है। जब दो लोगों के हित आपस में टकराते हैं, तो संबंध अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं या टूट जाते हैं। समय और परिस्थितियाँ भी लोगों को बदल देती हैं। जो व्यक्ति कभी हमारे बहुत करीब था, वही समय के साथ दूर हो जाता है, क्योंकि उसकी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं।
इस मतलबीपन का प्रभाव केवल रिश्तों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह व्यक्ति के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। जब बार-बार विश्वास टूटता है, तो व्यक्ति दूसरों पर भरोसा करना छोड़ देता है। वह अकेलापन महसूस करने लगता है, भले ही वह लोगों से घिरा हुआ हो। धीरे-धीरे वह भीतर से कठोर हो जाता है और दूसरों के प्रति उसकी संवेदनशीलता कम हो जाती है। यह स्थिति समाज के लिए भी खतरनाक है, क्योंकि इससे सामूहिक संवेदना का ह्रास होता है।
परन्तु यह कहना भी उचित नहीं होगा कि पूरी दुनिया ही मतलबी हो गई है। आज भी ऐसे लोग हैं, जो निस्वार्थ भाव से संबंध निभाते हैं, जो बिना किसी अपेक्षा के दूसरों की मदद करते हैं, जो कठिन समय में साथ खड़े रहते हैं। लेकिन ऐसे लोग अब कम होते जा रहे हैं। और जब हम बार-बार स्वार्थी लोगों से मिलते हैं, तो हमें लगता है कि हर कोई वैसा ही है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या किया जाए? क्या हम भी इस मतलबी दुनिया का हिस्सा बन जाएँ? या फिर अपने भीतर की अच्छाई को बचाए रखें? इसका उत्तर सरल नहीं है, परन्तु स्पष्ट है। हमें अपने दृष्टिकोण को संतुलित करना होगा। हमें अपेक्षाएँ कम करनी होंगी, क्योंकि जितनी अधिक अपेक्षा होगी, उतना अधिक दुःख होगा। हमें आत्मनिर्भर बनना होगा—भावनात्मक रूप से भी और आर्थिक रूप से भी—ताकि हम किसी पर निर्भर न रहें।
सबसे महत्वपूर्ण है—सही लोगों की पहचान करना। हर व्यक्ति हमारे जीवन में रहने योग्य नहीं होता। कुछ लोग केवल एक सीख देने के लिए आते हैं और फिर चले जाते हैं। हमें यह समझना होगा कि किसे अपने जीवन में स्थान देना है और किसे नहीं। साथ ही, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि दुनिया चाहे जैसी भी हो जाए, हमें अपनी निस्वार्थता और मानवता को नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि यदि हम भी मतलबी बन जाएंगे, तो फिर इस संसार में सच्चाई का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो यह जीवन एक यात्रा है, जहाँ हर व्यक्ति एक यात्री है। कोई थोड़ी देर के लिए हमारे साथ चलता है, तो कोई लंबा साथ निभाता है। लेकिन अंततः हर किसी को अपने रास्ते पर जाना होता है। इसलिए किसी के जाने या बदलने से हमें टूटना नहीं चाहिए। हमें यह स्वीकार करना होगा कि कोई भी व्यक्ति हमेशा के लिए हमारा नहीं है।
अंततः, “मतलबी है लोग यहाँ पर, मतलबी जमाना…”—यह केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि एक जागरूकता है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने जीवन को समझदारी से जीना होगा। हमें लोगों को समझना होगा, परिस्थितियों को स्वीकार करना होगा और सबसे बढ़कर—अपने भीतर की शक्ति को पहचानना होगा।
जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि जो आपके साथ केवल मतलब से जुड़ा है, वह कभी आपका था ही नहीं। और जो सच्चा है, वह किसी भी परिस्थिति में आपका साथ नहीं छोड़ेगा।
इसलिए यदि कोई आपको छोड़कर चला जाए, तो उसे जाने दीजिए। क्योंकि वह आपके जीवन में केवल एक अनुभव था, एक सीख था—न कि आपकी मंजिल।
और अंत में, बस इतना ही—
सच्चे रिश्ते कभी शोर नहीं करते, और जो शोर करते हैं, वे अक्सर सच्चे नहीं होते।
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