"प्रवहमान के बीच"
पंकज शर्मातीन शब्द—
जैसे किसी अथाह सागर का
तट पर आकर ठहर जाना,
पर भीतर—
अनगिनित ज्वारों की अनकही कथा।
मैंने जीवन को
कभी सूत्रों में नहीं बाँधा,
वह तो हर बार
मेरी पकड़ से फिसलकर
अपनी ही दिशा में बह निकला।
आज—
जब समय की धूल
आँखों में किरच-सी चुभती है,
और प्रश्न
अपने ही उत्तरों को संशय में डालते हैं,
तभी दिखता है—
एक अदृश्य प्रवाह,
जो विघ्नों के शिलाखंडों से टकराकर भी
अपनी गति का संकल्प नहीं खोता।
कष्ट,
मानो क्षणिक छायाएँ हों—
जो अस्त होते सूर्य के साथ
धीरे-धीरे
अपने ही अंधकार में विलीन हो जाती हैं।
और जीवन—
न कोई उद्घोष,
न कोई स्थिर प्रतिज्ञा,
केवल एक मौन, निरंतर चलायमान
स्वीकृति का स्पंदन।
शायद यही है—
सीख का सार,
कि अव्यवस्था के मध्य भी
एक सूक्ष्म व्यवस्था
अडिग रहती है।
अतः मैं कहता हूँ—
शब्दों की संक्षिप्तता में नहीं,
उनके अंतराल में सुनो—
जहाँ सब कुछ टूटते हुए भी
जीवन, अबाध,
चलता रहता है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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