"अंतर्यात्रा: एक अधूरा विसर्जन"
पंकज शर्मा
मैं खोजता रहा स्वयं को—
पर क्या सचमुच ‘स्वयं’ था कहीं?
या केवल भीड़ के कोलाहल में
प्रतिध्वनियों का एक भ्रमित अनुक्रम?
संबंधों की कच्ची पगडंडियों पर चलते हुए
कितनी बार लगा—
यहाँ कोई मेरा है।
पर हर स्पर्श के भीतर
एक अदृश्य दूरी थी,
हर निकटता के नीचे
एक अस्वीकार्य अकेलापन।
क्या अपेक्षाएँ ही संबंधों का आधार हैं?
या वे केवल भय के दूसरे नाम हैं—
छूट जाने के,
अप्रासंगिक हो जाने के?
परत-दर-परत खुलते इस दृश्य में
जो बाहर था,
वह धीरे-धीरे संदिग्ध होता गया।
क्या यह जगत सचमुच ‘बाहर’ है?
या मेरी ही चेतना का विस्तारित प्रतिबिंब—
एक मरीचिका,
जो प्यास को अर्थ देती है,
पर तृप्ति को टालती रहती है?
यदि सब प्रतिध्वनि है,
तो मूल स्वर कहाँ है?
और क्या वह स्वर
कभी सुना भी जा सकता है?
हर कोई अपने-अपने राग में लीन है—
पर क्या वह राग भी उसका अपना है?
या विरासत में मिली ध्वनियों का
अनजाना अनुकरण?
यहाँ ‘अपना’ और ‘पराया’
शायद शब्दों के भ्रम हैं।
क्योंकि जब संवेदनाएँ ही अनुवादित नहीं हो पातीं,
तो सेतु बनने से पहले ही
मौन में ढह जाते हैं।
तो क्या अकेलापन
कोई स्थिति नहीं,
बल्कि मूल प्रकृति है?
मैं ठहरकर सोचता हूँ—
यदि डूबना ही अपरिहार्य है,
तो क्या यह चयन संभव है
कि कहाँ डूबा जाए?
भीतर उतरने की बात कही जाती है—
पर ‘भीतर’ कहाँ है?
क्या वह कोई स्थान है,
या केवल दिशा का भ्रम?
और यदि भीतर भी उतना ही अनिश्चित है
जितना बाहर,
तो यह यात्रा किसकी ओर है?
फिर भी—
कभी-कभी एक क्षीण आभास उभरता है—
न कोई स्पष्ट स्वरूप,
न कोई स्थायी पहचान,
बस एक उपस्थिति,
जो न पूरी तरह ‘मैं’ है,
न पूरी तरह ‘अन्य’।
क्या वही केंद्र है?
या केंद्र का भी विचार
मन की एक रचना मात्र है?
यदि अस्मिता शून्य में विलीन होती है,
तो क्या वह विनाश है,
या किसी और प्रकार की पूर्णता?
कहा जाता है—
स्वयं में डूबो,
वहीं अपनापन है।
पर यह ‘अपनापन’—
क्या वह भी एक सांत्वना है,
जो विस्मृति के भय को ढकती है?
और यदि सब कुछ अंततः
विस्मृति में समा जाना है,
तो यह यात्रा—
यह प्रयत्न—
किसलिए?
फिर भी…
एक आग्रह बना रहता है—
जैसे कोई अदृश्य खिंचाव,
जो बाहर से भीतर की ओर नहीं,
बल्कि अज्ञात से और अधिक अज्ञात की ओर ले जाता है।
तो क्या छलांग लगाना ही विकल्प है?
या यह भी एक रूपक है,
जिससे हम निर्णय के भय को सरल बनाते हैं?
शायद—
पूर्णता कोई उपलब्धि नहीं,
बल्कि प्रश्नों के साथ जीने की क्षमता है।
और जो ‘डूब गया’—
वह वास्तव में पूर्ण हुआ या नहीं,
यह भी एक अनुत्तरित प्रश्न ही है।
अंतर्यात्रा शायद विसर्जन नहीं,
बल्कि
विसर्जन की निरंतर संभावना है—
जहाँ हर उत्तर
एक नए प्रश्न में घुल जाता है,
और हर खोज
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️
(शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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