चैत्र मास के शुक्लपक्ष के प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक वासंती नवरात्र मनाया जाता है। इसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा अर्चना होती है। इसमें अंतिम दिन नवमी को रामनवमी भी कहा जाता है। भारतवर्ष में यह दिन भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
प्रभु श्रीराम हिन्दुओं के भगवान हैं। उनका जन्म भारतवर्ष के अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश में राजा दशरथ के पुत्र के रूप में हुआ था। अयोध्या उनका राज्य था और वे यहाँ के राजा थे। उनके जन्म स्थल अयोध्या में अब एक भव्य मन्दिर का निर्माण हुआ है तथा उस भव्य मन्दिर में राम लला की मूर्ति की प्राण- प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक समारोह २२ जनवरी २०२४ को आयोजित किया गया था।
भगवान श्रीराम को आस्थावान लोगों द्वारा उन्हें विष्णु के अवतार के रूप में माना जाता है और वे एक ऐतिहासिक महापुरुष हैं। वहीं इसी देश में कुछ लोग विशेषकर पाश्चात्य विद्वान राम को एक आदर्श राजा की काल्पनिक कहानी मानते हैं, जिसे भारतीय समाज में आदर्श स्थापित करने के लिए रचा गया है। कुछ लोगों ने तो भगवान श्रीराम का राजनीतिकरण ही कर डाला है। इस देश में कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा वाले समूहों ने राम मन्दिर के बनने और श्रीराम की मूर्ति की प्राण- प्रतिष्ठा के मुद्दे को भक्ति एवं श्रद्धा से ज्यादा राजनीतिक हथियार के रूप में किया। इन लोगों ने भगवान श्रीराम के तथ्यों को समाज के सामने तोड़ मरोड़ कर पेश किया।
श्रीरामचरितमानस में संत तुलसीदास जी ने भी कई जगहों पर भगवान श्रीराम के संबंध में कुछ शंका और उनके समाधान के विषय में बहुत ही स्पष्ट रूप से वर्णन किया है। एक बार तो स्वयं माता सति भी, जो भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं, श्रीराम के बारे में शंका कर उनकी परीक्षा लेने चली जाती हैं।
दो०- ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद।।
अर्थात जो ब्रह्म तत्व जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, जो कामना रहित हैं, और जिनको वेद भी नहीं जान सकता है, वो भला शरीर धारण कर नर रुप में राम कैसे हो सकते हैं।
दो ०- प्रभु सोइ राम की अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचार।।
माता सति भगवान शिव से पुछती हैं कि हे प्रभु आप जिस राम को सदा भजते रहते हैं , ये वहीं राम हैं या कोई और है। आप सब कुछ जानने वाले हैं सो कृपा कर मुझे बताइये।
दो०- अति विचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदय धरहिं कछु आन।।
अर्थात भगवान का चरित्र विचित्र है, जिसे ज्ञानी व्यक्ति ही समझ सकता है। जो लोग मतिमंद अथवा अल्प बुद्धि के हैं वो मोह ग्रसित होकर अपने हृदय में कुछ और ही समझ बैठते हैं। और मोह तथा अज्ञानता वश भगवान श्रीराम को नहीं पहचान सकते हैं।
इसलिए संत तुलसीदास जी ने स्पष्ट रूप से श्रीरामचरितमानस में कहा है कि राम अनंत हैं और उनके गुण अनंत हैं। श्रीराम की कथा का विस्तार भी असिमित है। इसलिए जिनके विचार स्वच्छ हैं वो इसे जानकर आश्चर्य नहीं मानते हैं, बल्कि निश्छल भाव से भगवान श्रीराम में विश्वास करते हैं और उन्हें भजते रहते हैं। ऐसे लोग भगवान श्रीराम के विषय में तर्क वितर्क नहीं करते और कोई शंका नहीं करते हैं।
दो०- राम अनंत अनंत गुन अमित कथा विस्तार।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह के बिमल विचार।।
जय श्री राम🙏🙏
जय प्रकाश कुवंर

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