मार्कण्डेय शारदेय
राम कई तरह से हममें रमते हैं।कहीं निर्गुण हैं तो कहीं सगुण।कहीं महामानव हैं तो कहीं अवतारी।कोई अपने बच्चों में देखता है तो कोई सबमें- सीय-राममय सब जग जानी।कोई श्रेष्ठ व आदर्श राजा मानता है तो कोई सबसे लायक पुत्र।कोई अपने बड़े भाई में देखना चाहता है तो कोई समाज-संस्कारकों में।
दरअसल; राम का व्यक्तित्व एवं कृतित्व ही ऐसा है कि समाज में उनका स्वरूप किसी-न-किसी तरह रहेगा ही।वे सार्वकालिक मानवीय मूल्यों के मानदण्ड हैं।इसी कारण मानव से महामानव, महामानव से अतिमानव, अतिमानव से देवपुरुष और देवपुरुष से दिव्य होते-होते सगुण ब्रह्म तक होते गए।जैसे बच्चा अपने अभिभावकों का साथ पाकर निर्भय-निडर रहता है, वैसे ही हम श्रीराम का स्मरण कर सदैव सुख पाते हैं।हम मानते हैं कि वे हर कष्ट को दूर करनेवाले, सब तरह के सुख-साधन देनेवाले तथा सदा लोकहित में अनुरक्त रहनेवाले हैं।वे चाहे, जहाँ, जैसे हों; उनका नमन करने से कोई काम रुकता नहीं है:
आपदाम् अपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्।।
राम जब रहे होंगे, उस समय वहाँ के लोग उनके रूप-गुण से निहाल रहे ही होंगे।समसामयिकों ने परवर्ती पीढ़ी को आँखों देखा सुनाया होगा।उनकी परवर्ती पीढ़ी ने बाबा-दादा के मुँह से सुनी बातें अपनी परवर्ती को सुनाई होगी।इस तरह सुदूर काल का चरित्र आज हम तक फैला है।कल भी फैला ही रहेगा।इसीलिए वे कवियों, लोकगायकों के भी आदर्श बने रहे।‘प्रसन्नराघव’ के नाटककार जयदेव ने यही बात अपनी काव्यात्मक भाषा में प्रस्तुत की है:
चन्द्रे वा रामचन्द्रे वा नारीणां च दृगंचले।
नीलोत्पल- सुहृत्कान्तौ कस्य नाSSमोदते मनः।।(1.10)
अर्थात्; सूर्य से प्रकाशित चन्द्रमा, नीलकमल-से रामचन्द्रजी तथा रमणी-कटाक्षों में किसका मन नहीं रमता!
राम में लोग तथा लोगों में राम चाहे जिस रूप में रमण करते ही हैं।इसीलिए शिष्ट साहित्य में ही नहीं लोकसाहित्य में भी उनका प्रसार है।
लोकगीतों में ऋतुपरक गीतों में चैता भी है, जिसे चइता, चैतवार या घाँटो भी कहते हैं।चैता चैत महीने से सम्बद्ध है।यह भी बसन्ती गीत है।चूँकि यह ऋतु शृंगार रस का मुख्य आधार है, इसलिए इसमें शृंगार के संयोग-वियोग पक्ष अधिक उजागर हुए हैं।लेकिन; यह भी बड़ी बात है कि इसी महीने श्रीराम का जन्म भी हुआ था।ऐसे में लोककवि इन्हें कैसे छोड़ सकता है? पुनः: जब कोई मर्यादा- पुरुषोत्तम को वर्ण्य व गेय बनाएगा तो स्वयं मर्यादित रहेगा न! इस कारण इस विधा के लोकगीतों में सुन्दर-सुन्दर हृदयाह्लादक राम-रसायन की प्राप्ति होती है।
एक चैता में रामजन्म का वर्णन है।तदनुसार चैत में अयोध्या में श्रीराम का जन्म हुआ है।घर-घर बधावा (बधाई गीतों से युक्त बाजे) बज रहे हैं:
आहो रामा! चैत अजोध्या राम जनमलें; हो रामा!
घरे-घरे।बाजेला आनन्द बधइया; हो रामा! घरे-घरे।।
इसी गीत में आगे नार कटाई, सूतिका-स्नान के बाद अति उत्साह के साथ न्यौछावर का वर्णन आता है।महाराज दशरथ अन्न, धन, सुवर्ण दान कर रहें हैं तो महारानी कौसल्या गायें दे रही हैं।बानगी देखी जाए:
आहो रामा! दशरथ लुटावेलें अन-धन सोनवा; हो रामा!
कौसिला लुटावे धेनु गइया; हो रामा!
लगभग इसी तरह का एक और जन्मोत्सव गीत है।बहुत साम्य के बावजूद कुछ अन्तर भी है। अन्तर यह है कि यहाँ धेनु गइया है तो वहाँ मुँदरिया (मुद्रिका) है।हाँ; एक और बात यह है कि वहाँ कैकेयी की अपार खुशी भी जाहिर हुई है।अन्तिम बन्द देखा जाए:
आहो रामा! कैकेई लुटावेली सोने के मुँदरिया; हो रामा!
आहो रामा! कौसिला लुटावेली , रतन पदारथ; हो रामा! घरे घरे।।
रामकथा से ही सम्बद्ध एक चैता में धनुष-यज्ञ का वर्णन है।लोककवि के अनुसार महाराज जनक ने कठिन प्रण ले लिया है।उन्होंने अपने पत्रवाहकों के माध्यम से देश-देश के राजाओं के पास सीता-स्वयंवर से सम्बन्धित अपना प्रतिज्ञा-सन्देश भेज दिया: राजा जनक जी कठिन प्रन ठाने; हो रामा! देसे देसे; लिखि-लिखि पतिया पठावे; हो रामा ! देसे देसे। देश-विदेश के राजा लोग आ भी गए, लेकिन उनमें से किसी के पास शिवधनुष उठाने की सामर्थ्य नहीं रही- .... केहू नाहीं संकर चाप चढ़ावे; हो रामा!
आगे कवि कहता है कि अयोध्या-नरेश दशरथ के दो राजकुमार जनकपुरी गए थे।उनमें रामचन्द्र ने एक हाथ से धनुष उठाया और दूसरे हाथ से अपना मुकुट सम्हाला।इसके बाद का अंश तो अप्राप्य है, तो भी स्पष्ट ही है कि उन्होंने धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाई कि वह टूट गया।गीतांश देखा जाए:
आहो रामा! एक हाथे रामचन्द्र धेनुहा उठावे; हो रामा!
दूजे हाथे, क्रीट मुकुट सरिहावे हो; रामा! दूजे हाथे।।
श्रीराम के अतिरिक्त श्रीकृष्ण और भगवान शंकर से सम्बन्धित भी चैता हैं।कारण कि पूज्य पुरुषों में इनकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है।फिर भी चैत्रशुक्ल नवमी को श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है, इसलिए चैत और चैता के साथ श्रीराम का जुड़ाव विशेष महत्त्व रखता है।
हाँ; बार-बार आगे-पीछे राम को जोड़ राममय चैता आरोह-अवरोह के साथ गेय गीतों में विशेष मनोहर होता है।साधारणतः मादक मौसम के कारण लोग चलते-फिरते खेत-खलिहानों, बाग-बगीचों या दरवाजे-दालानों में भी मुखर हो जाते हैं।परन्तु; जब ढोलक-झाल-जैसे बाजों के साथ सामूहिक रूप में गाया जाता है तो उसका आनन्द ही कुछ और होता है।झालों की कलाकारी ऐसी होती है कि लगता है शब्दों की कभी हल्की-हल्की तो कभी जोरों की कुटाई हो रही है।इसी कारण झलकुटिया भी कहते हैं।इस झलकुटिया में आनन्द के उत्थान पर गायक घुटनों के बल आ जाते हैं।जैसे वैद्यजन खरल में ओषधियाँ डालकर खूब घोटते हैं या दूध को खूब घोटकर खोया बनाया जाता है, वैसे ही इन गीतों में शब्दों की भावों और स्वरों के साथ अधिकाधिक घोटाई होती है। सम्भव है; इसीलिए इसका नाम ‘घाँटो’ भी है।वाकई; इस गीत की स्वरलहरी वातावरण में मादक बसन्ती रस घोल देती है।श्रीराम से सम्बन्धित भक्तिपरक चैता भले गाए जाते हों, पर इसका शृंगार रस ही प्राणतत्त्व है।
(मेरी पुस्तक 'सांस्कृतिक तत्त्वबोध' से)

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