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"मौन के पार एक संकेत"

"मौन के पार एक संकेत"

पंकज शर्मा
शब्द मेरे भीतर
किसी अनाम वन की तरह उगते हैं—
घने,
परस्पर उलझे हुए।
मैं उन्हें छूता हूँ,
वे ध्वनि नहीं,
केवल स्पंदन देते हैं।


समय
एक पारदर्शी दीवार है—
मैं उसे देख सकता हूँ,
पर पार नहीं जा पाता।
क्षण
हथेली पर ठहरते हैं,
और फिर
रेत की तरह फिसल जाते हैं।


कभी साहस
दूर के दीपस्तंभ-सा दिखता है,
पर समुद्र के भीतर
मेरी नाव
लहरों से समझौता करती रहती है।
मैं दिशा जानता हूँ—
चल नहीं पाता।


मन की सतह
शांत जल है,
पर तल में
अदृश्य धाराएँ
एक-दूसरे से टकराती हैं।
यह अशांति
कोलाहल नहीं—
एक गहरी, निरंतर गूँज है।


प्रतीक्षा—
किसी व्यक्ति की नहीं,
किसी घटना की भी नहीं।
शायद उस क्षण की
जब भीतर का द्वार
स्वतः खुल जाए,
और मैं
अपने ही सामने निर्वस्त्र खड़ा रह सकूँ।


मौन
मेरी शरण भी है,
मेरा बंधन भी।
उसी में मैं छिपता हूँ,
उसी में स्वयं को
खोजने का प्रयत्न करता हूँ।


कभी लगता है—
जो अनकहा है,
वही अधिक सत्य है।
शब्द
अक्सर अर्थ को सीमित कर देते हैं,
जबकि मौन
उसे विस्तार देता है।


इसलिए मैं ठहरा हूँ—
अधूरा नहीं,
केवल प्रतीक्षारत।
शायद अगला क्षण
मेरे भीतर
एक सूक्ष्म संकेत रख जाएगा,
और वही
मेरी अभिव्यक्ति का प्रारंभ होगा।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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