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युग-युगांतर के महानायक: पवनपुत्र हनुमान

युग-युगांतर के महानायक: पवनपुत्र हनुमान

सत्येन्द्र कुमार पाठक
आस्था के चिरंजीवी स्तंभ भारतीय अध्यात्म और सांस्कृतिक चेतना के आकाश में हनुमान जी एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी आभा सतयुग से लेकर कलयुग तक एक समान बनी हुई है। वे केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि शक्ति, बुद्धि, भक्ति और निस्वार्थ सेवा के जीवंत दर्शन हैं। 'वायु' की तरह सर्वव्यापी और 'वज्र' की तरह सुदृढ़ हनुमान जी का व्यक्तित्व आज के अशांत विश्व के लिए 'संकटमोचन' की भूमिका निभा रहा है।
जन्म रहस्य और प्राकट्य भूमि: अंजन पर्वत का गौरव - हनुमान जी के जन्म को लेकर विभिन्न पुराणों और स्थानीय लोक-कथाओं में अद्भुत सामंजस्य मिलता है। जन्म काल: त्रेतायुग के संधिकाल में, चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को मंगलवार के दिन, चित्रा नक्षत्र के शुभ संयोग में हनुमान जी का प्राकट्य हुआ। झारखंड का अंजन पर्वत (गुमला): शोधपूर्ण आलेखों के अनुसार, झारखंड प्रदेश के गुमला जिले में स्थित अंजन पर्वत और उसका मैदानी भाग हनुमान जी की मूल जन्मस्थली है। यहाँ स्थित 'अंजनी गुफा' आज भी उस दिव्य घटना की साक्षी है जहाँ माता अंजनी ने कठोर तप किया था। रुद्रावतार का संकल्प: हनुमान जी का जन्म भगवान शिव की एक महान 'लीला' थी। रावण ने अपनी मोक्ष प्राप्ति हेतु शिवजी से वरदान माँगा था। शिवजी ने राम के हाथों रावण को मोक्ष दिलवाने और धर्म स्थापना में सहायता हेतु स्वयं हनुमान के रूप में अवतार लिया। माता-पिता: वायु देव के आशीर्वाद से केसरी और माता अंजनी के घर जन्मे मारुति को वह अदम्य ऊर्जा मिली, जिसने उन्हें 'पवनसुत' बनाया।
कालचक्र में हनुमान: सतयुग से आधुनिक काल तक -हनुमान जी 'चिरंजीवी' (अमर) हैं। वे समय की सीमाओं को लांघकर हर युग में मार्गदर्शक बने रहे हैं। सतयुग (शिव संकल्प): इस युग में वे शिव तत्व के रूप में आगामी 'राम-काज' हेतु संकल्पित रहे। त्रेतायुग (स्वर्ण युग): यह उनके पराक्रम का शिखर था। सुग्रीव-राम मित्रता, लंका दहन और संजीवनी लाने जैसे कार्यों ने उन्हें 'अतुलितबलधामं' सिद्ध किया। द्वापरयुग (रक्षक और मार्गदर्शक): भीम का अहंकार चूर करना और महाभारत के भीषण युद्ध में अर्जुन के रथ (कपिध्वज) पर विराजमान होकर धर्म की रक्षा करना उनकी अमरता का प्रमाण है। मुगल एवं ब्रिटिश काल (सांस्कृतिक प्रतिरोध): जब भारतीय संस्कृति संकट में थी, तब गोस्वामी तुलसीदास और समर्थ रामदास ने हनुमान जी को 'शक्ति और संगठन' के प्रतीक के रूप में घर-घर पहुँचाया। अखाड़ों की स्थापना कर युवाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाया गया। आधुनिक काल (ग्लोबल आइकॉन): आज वे 'स्ट्रेस मैनेजमेंट', 'निर्णय क्षमता' और 'एकाग्रता' के वैश्विक प्रतीक है । संस्कृतियों का दिव्य संगम हनुमान जी का व्यक्तित्व चार प्रमुख दार्शनिक धाराओं का मेल है: वायु संस्कृति: यह निरंतर प्राण ऊर्जा और गतिशीलता का प्रतीक है। मारुत संस्कृति: यह अनुशासन, शौर्य और अन्याय के विरुद्ध गर्जना का प्रतीक है। अंजनी संस्कृति: यह माता द्वारा दिए गए उच्च संस्कारों, तपस्या और पवित्रता की नींव है। हनुमंत संस्कृति: यह ज्ञान और विनम्रता का शिखर है। 'हनु' (ज्ञान) और 'मान' (सम्मान) का योग ही उन्हें 'ज्ञानिनामग्रगण्यम्' बनाता है। भारत के हर राज्य में हनुमान जी स्थानीय संस्कृति के रंग में रंगे हैं: उत्तर भारत (यू.पी., बिहार, झारखंड): यहाँ वे 'बजरंग बली' हैं। अयोध्या के हनुमान गढ़ी और पटना के महावीर मंदिर में वे रक्षक रूप में पूज्य हैं। दक्षिण भारत (तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र): यहाँ वे 'आंजनेयर' और 'मुख्यप्राण' हैं। यहाँ उन्हें सिन्दूर के बजाय पान के पत्तों और 'वड़ा-माला' चढ़ाई जाती है।राजस्थान (सालासार व मेहंदीपुर): यहाँ हनुमान जी 'बालाजी' के रूप में दाढ़ी-मूंछ वाले स्वरूप और संकट निवारक के रूप में प्रसिद्ध हैं। ओडिशा व बंगाल: यहाँ 'महावीर' के रूप में शारीरिक बल और अखाड़ा संस्कृति के माध्यम से उनकी पूजा होती है।
वैश्विक मारुति हनुमान जी की गूँज केवल भारत तक सीमित नहीं है: नेपाल व थाईलैंड: नेपाल में 'हनुमान ढोका' और थाईलैंड में 'रामकियेन' के नायक के रूप में वे घर-घर में प्रतिष्ठित हैं। चीन (मंकी किंग): प्रसिद्ध चीनी पात्र 'सन वुकॉन्ग' काफी हद तक हनुमान जी की शक्तियों से प्रेरित माना जाता है। अमेरिका व यूरोप: यहाँ हनुमान जी 'योग' और 'पॉजिटिविटी' के केंद्र हैं। त्रिनिदाद में स्थित उनकी 85 फीट ऊँची प्रतिमा कैरिबियाई देशों की पहचान है। प्राचीन सभ्यताएँ (मिस्र, ईरान, इराक): शोध बताते हैं कि प्राचीन मेसोपोटामिया और मिस्र में वानर-तत्व को बुद्धि का प्रतीक माना जाता था, जो हनुमान जी के ऐतिहासिक प्रभाव की ओर संकेत करता है। हनुमान जी के गुरु और विद्वत्ता में हनुमान जी केवल 'बाहुबली' नहीं, बल्कि 'विद्यावान' भी हैं। : उन्होंने सूर्य देव से वेदों का ज्ञान लिया। माता अंजनी, भगवान शिव और ऋषि मातंग ने उनके चरित्र का निर्माण किया।: वाल्मीकि रामायण के अनुसार, वे 'नव-व्याकरण-वेत्ता' थे। उनकी भाषा इतनी शुद्ध थी कि स्वयं भगवान राम उनके संवाद कौशल के कायल हो गए थे ।: प्रभु राम की लंबी आयु हेतु स्वयं को रंग लेना, भक्ति की पराकाष्ठा है। सिन्दूर ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है। दक्षिण मुखी मूर्ति: दक्षिण दिशा यम और भय की मानी जाती है। दक्षिण मुखी हनुमान के दर्शन समस्त भयों और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करते हैं।
सुंदरकांड व हनुमान चालीसा केवल मंत्र नहीं, बल्कि आत्मविश्वास बढ़ाने के मनोवैज्ञानिक अस्त्र हैं।
आज के इस तकनीकी और तनावपूर्ण युग में, हनुमान जी का चरित्र हमें सिखाता है कि अपार शक्ति होने के बावजूद 'विनम्र' कैसे रहा जाता है और बड़े से बड़े संकट में 'धैर्य' के साथ समाधान कैसे ढूँढा जाता है। वे अंजन पर्वत की गुफाओं से लेकर न्यूयॉर्क के मंदिरों तक एक समान प्रेरणा देते हैं। जब तक मानवता को साहस और भक्ति की आवश्यकता रहेगी, पवनपुत्र हनुमान अपनी अमर उपस्थिति से विश्व का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
"चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।"
जय श्री राम! जय वीर हनुमान ।
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