करुणानिधि की करुणा

आनन्द हठीला
एक बार भगवान राम और लक्ष्मण दोनों भाई एक सरोवर में स्नान के लिए उतरे । उतरते समय उन्होंने अपने-अपने धनुष बाहर तट पर गाड़ दिए । जब वे स्नान करके बाहर निकले तो लक्ष्मण ने देखा की उनकी धनुष की नोक पर रक्त लगा हुआ था !
उन्होंने भगवान राम से कहा -" भ्राताश्री ! लगता है कि अनजाने में कोई हिंसा हो गई ।"
दोनों ने मिटटी हटाकर देखा तो पता चला कि वहां एक मेढ़क मरणासन्न पड़ा हुआ है ।
भगवान राम ने करुणावश मेंढक से कहा- " तुमने आवाज क्यों नहीं दी ? कुछ हलचल,छटपटाहट तो करनी थी। हम लोग तुम्हे बचा लेते । जब सांप तुम्हे पकड़ता है तब तो तुम खूब आवाज लगाते हो । धनुष लगा तो क्यों नहीं बोले ?
मेंढक बोला - प्रभु ! जब सांप पकड़ता है, तब मैं ' राम- राम ' चिल्लाता हूँ । एक आशा और विश्वास रहता है कि प्रभु अवश्य पुकार सुनेंगे। परन्तु आज जब देखा की साक्षात् भगवान् श्री राम स्वयं धनुष लगा रहे है तो किसे पुकारता ? आपके सिवाय किसी और का नाम याद नहीँ आया । बस इसी को अपना सौभाग्य मानकर चुपचाप सहता रहा ।
सच्चे भक्त जीवन के हर क्षण को भगवान का आशीर्वाद मानकर उसे स्वीकार करते हैं । जब दुःख होता है वो उसे अपनी गलती की सजा समझते है और जब सुख होता है तो उसे ईश्वर की दया समझते है ।
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