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मेहबूब का स्वागत

मेहबूब का स्वागत


चाँद भी आज न जाने
क्यों शर्मा रहा है।
जबकि उसे पता है की
मेरा मेहबूब आ रहा है।।


धरा पर बिखेर दो फूलो को
हे बाग़ीचे की रानी तुम।
मेरे मेहबूब के स्वागत
और उसके सत्कार में।।


घटाओं तुम भी बिछा दो
अपनी कालि घटाओं को।
और वर्षा दो आकाश तुम
मेहबूब के आने की खुशी में।।


चाँद तारे तुम भी निकल आओं
पूर्णिमा की रात आज बनकर।
और महक उठो रात की रानी
मेहबूब के आने से पहले तुम।।


मिलन होगा मोहब्बत का
शमा के जलने पर आज।
चिराग बुझे पड़े थे जो दिलके
मिलन से आज जल उठे वो।।


लगाये आँख बैठी है स्वागत में
बसुन्धरा ओस बनकर बरसाने को।
बिछा दी मोती की चादर उसने
मेहबूब के लिए हरी हरी घास पर।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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