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"दहलीज़ : मौन स्मृतियों की संरक्षिका"

"दहलीज़ : मौन स्मृतियों की संरक्षिका"

पंकज शर्मा
वह केवल पत्थर की रेखा नहीं,
समय की उँगलियों से खिंची
एक अदृश्य मर्यादा है—
जहाँ घर की साँसें
धीमे-धीमे स्वर लेती हैं।


वह न जाने कितने आगमन की ध्वनियाँ
अपने निस्तब्ध वक्ष में संजोए बैठी है,
हर पगचिह्न उसके लिए
एक कथा है,
जो शब्दों से नहीं,
स्पर्श से लिखी जाती है।


अंतरंग कक्षों की हँसी
और बाह्य जगत के संघर्षों के मध्य
वह एक संवेदनशील सीमा-रेखा है,
जो तूफ़ानों को थामकर
भीतर की शांति को सुरक्षित रखती है।


कितनी ही विदाइयों के नम क्षण
उसकी कठोर देह पर
ओस की बूँदों-से ठिठके रहे,
और कितने स्वागतों की उजली मुस्कान
उसकी शिला में
अनंत के लिए अंकित हो गई।


वह घर की आत्मा का
निरव प्रहरी है—
जो बिना बोले भी
संबंधों की ऊष्मा को पहचानता है,
और मौन रहकर
मर्यादाओं की रक्षा करता है।


जब भी कोई मन
अंदर से टूटकर बाहर जाता है,
वह उसकी थरथराती आहों को
अपने भीतर समेट लेती है,
मानो पीड़ा को भी
घर की गरिमा में रूपांतरित कर दे।


संध्या की धुंधली रोशनी में
वह स्मृतियों का दीप-स्तंभ बनकर
अतीत और वर्तमान को जोड़ती है,
जहाँ हर आहट
एक जीवित इतिहास बन जाती है।


इस प्रकार वह दहलीज़
मात्र एक सीमारेखा नहीं,
वरन् संवेदनाओं की शाश्वत साक्षी है—
जो घर के भीतर की आत्मीयता
और बाहर के अनंत संसार के बीच
अनुभूतियों का मौन सेतु बनी रहती है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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