होली का हुड़दंग और ढुंढा का अंत
सत्येंद्र कुमार पाठकआओ मिलकर शोर मचाएं, ढुंढा को अब दूर भगाएं।
हंसी-ठिठोली, ढोल-नगाड़े, खुशियों के हम दीप जलाएं।
प्रियांशु बोला, दिव्यांशु से— "डरने की कोई बात नहीं",
नन्हा बुच्चन साथ खड़ा है, आओ हम सब धूम मचाएं।
मम्मी-पापा कहते देखो, "हुड़दंग यह बीमारी नहीं",
नकारात्मकता के दानव को, अट्टहास से मार गिराएं।
शिव का है वरदान यही कि, 'ध्वनि-युद्ध' ही जीतेगा,
गीत सुनाएं, नाचें-गाएं, मन के भय को दूर भगाएं।
गोबर के उपलों की माला, अग्नि को हम अर्पण कर,
शुद्ध हवा हो, स्वस्थ धरा हो, ऐसी रस्में आज निभाएं।
बैर-भाव और ऊंच-नीच का, अंत करे यह पावन पर्व,
बच्चे बनकर खेलें सब मिल, जग में प्रेम की अलख जगाएं।
वो कहानी ढूंढा रानी, त्रेतायुग की दिव्य निशानी,
राक्षस कुल की एक 'ढुंढा' थी, मायावी और बड़ी सयानी।
शिव से उसने वर पाया था— "अस्त्र न मुझको मार सकें",
देव, दनुज या मानव कोई, कभी न मेरा काल बनें।
अदृश्य होकर धूल-धुएं में, बच्चों को वो डराती थी,
बीमारी और भय का साया, गलियों में फैलाती थी।
तब भोले ने राह दिखाई— "अस्त्र यहाँ न काम करेंगे,
सामूहिक अट्टहास जहाँ हो, वहाँ न दानव पाँव धरेंगे।"
प्रियांशु बोला, दिव्यांशु से— "ढोल उठाओ, शोर मचाओ",
नन्हा बच्चन संग खड़ा है— "खुलकर नाचो, धूम मचाओ!"
मम्मी-पापा ने समझाया— "यह हुड़दंग नहीं खेल है,
बीमारी के कीटाणुओं का, शोर ही असली जेल है।"
चिल्लाने से, हँसने से, बढ़ता है मन का विश्वास,
एंडोर्फिंस और डोपामिन का, होता है भीतर वास।
गोबर के उपलों की माला, अग्नि में हम डाल रहे,
वातावरण को शुद्ध बनाकर, स्वस्थ समाज को पाल रहे।
चीन हो या जापान देश, हर जगह 'शोर' का पहरा है,
बुराई को भगाने का यह, विज्ञान बहुत ही गहरा है।
तो झूम के नाचो, मिलकर गाओ, होली का त्यौहार मनाओ,
ढुंढा जैसी नकारात्मकता को, हँसकर दूर भगाओ!
पात्रों का जुड़ाव: प्रियांशु, दिव्यांशु और बच्चन के माध्यम से बच्चे स्वयं को कहानी का हिस्सा महसूस करेंगे।
समें केवल कहानी नहीं, बल्कि 'साउंड बैरियर' और 'कीटाणु नाश' जैसे वैज्ञानिक पहलुओं को सरल शब्दों में पिरोया गया है।सकारात्मक संदेश: यह सिखाती है कि 'आनंद' और 'एकजुटता' ही सबसे बड़े सुरक्षा कवच है।
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