करे वाला उ प्यार कहाॅं बा
अरुण दिव्यांशकरे वाला उ प्यार कहाॅं बा ,
बा त मन के स्वीकार कहाॅं बा ,
खिल जाए जवना से जीवन ,
जिनगी में उ बहार कहाॅं बा ।
पहिले वाला आहार कहाॅं बा ,
निश्छल निर्मल विचार कहाॅं बा ,
इंसानी मन के जवन भावत ,
इंसान के उ आचार कहाॅं बा ।
आचारे से त विचार बनेला ,
विचारे से त व्यवहार बनेला ,
व्यवहारे प्रेम के असली जड़ ,
व्यवहारे से त प्यार बनेला ।
ना रहल उ आचार विचार ,
ना रह गईल व्यवहार अब ,
आचार विचार भईल कमी ,
जीवन में कहाॅं बहार अब ।
प्यार ना लैला मजनूॅं कहानी ,
प्यार ना कहानी हीर राॅंझा ,
मातपिता चाचा चाची भाई ,
बहन दादा दादी संग साझा ।
हबसी प्यार बा भरल जहाॅं ,
वासना भरल प्यार जहाॅं बा ,
प्रेमी प्रेमिका खूब प्रचलित ,
करे वाला उ प्यार कहाॅं बा ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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