काश तुम मेरे होते
काश तुम गर मेरे ही होते ,मेरे हस्त भी ध्वजा होता ।
चलते हम तुम संग संग ,
चेहरे बारह न बजा होता ।।
हम तुम गर अपने ही होते ,
अपना घर ये सजा होता ।
संग संग हम झूलते झूला ,
जीने का और मजा होता ।।
प्यार हमारा परवान चढ़ता ,
छल कपट तू तजा होता ।
तोड़ लाता मैं नभ से तारे ,
मेरे लिए कुछ कजा होता ।।
मैं भी कभी दुःखी न होता ,
ईश को गर मैं भजा होता ।
काश तुम गर मेरे ही होते ,
जीवन बहुत सजा होता ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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