खंड खंड में पाखंड है ,
खंड खंड में ही खंड ।खंड खंड में घमण्ड है ,
खंड खंड में लउर डंड ।।
वेद भी जब लवेद हुआ ,
घमंड बना जीवन दंड ।
घमंड ईर्ष्या शोषण युद्ध ,
घमंड मानव का दोर्दंड ।।
खंड खंड का अंड बना ,
चौक चौराहे छनते कंड ।
असहाय शांति अपनाते ,
पूॅंजीपति बन जाते मंड ।।
तलवार का चंड धार हो ,
या अरि दंड हो तुम प्रचंड ।
या रक्त पड़ा है ठंड तेरा ,
हो हो चुके तुम भी पंड ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।शब्दार्थ : लउर = लाठी डंडा , अंड = मन में सोच पैदा होना , कंड = कूटना , छाॅंटना , मंड = मेंढ़क , चंड = तीक्ष्ण , प्रखर , प्रचंड = भयंकर , असह्य , पंड = नपुंसक , जिस वृक्ष में फल न लगे ,
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